भारत-अमेरिका ट्रेड डील: रिश्तों की जमी बर्फ पिघली, क्या अब चीन-बांग्लादेश को टक्कर दे पाएगा भारत?
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नई दिल्ली: भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से अटकी ट्रेड डील को लेकर सुगबुगाहट एक बार फिर तेज हो गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच हालिया बातचीत के बाद, वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल अमेरिका के दौरे पर हैं और डील को अंतिम रूप देने की कवायद में जुटे हैं।

वार्ता का नया दौर: क्या है ताजा स्थिति?

वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने मिल्वॉकी में अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) जैमीसन ग्रीर के साथ विस्तृत चर्चा की है। दोनों नेताओं के बीच अंतरिम व्यापार समझौते को लेकर सार्थक बातचीत हुई है। पीएम मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप की फोन पर हुई बातचीत के बाद इस प्रक्रिया में तेजी आई है, जिसका मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के लिए फायदेमंद स्थितियों का निर्माण करना है।

क्यों अटकी थी यह डील?

फरवरी में इस समझौते की रूपरेखा तैयार की गई थी, लेकिन अमेरिका की टैरिफ नीति में बदलाव के कारण मामला अटक गया था। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने स्पष्ट किया था कि भारत के छोटे किसानों और छोटे उत्पादकों के हितों की रक्षा हेतु कुछ जटिल पहलुओं पर बारीकी से काम करना जरूरी था। फरवरी से ठंडे बस्ते में गई यह फाइल अब फिर से सक्रिय हो गई है।

MFN का दर्जा क्यों मांग रहा भारत?

इस ट्रेड डील में भारत की सबसे बड़ी मांग Most-Favoured-Nation (MFN) का दर्जा हासिल करना है। इसका सीधा मतलब है कि अमेरिका अपने अन्य व्यापारिक साझीदारों के साथ जैसा व्यवहार रखेगा, भारत को भी वही निष्पक्ष और समान टैरिफ ट्रीटमेंट मिलना चाहिए।

भारत को डर है कि कहीं अमेरिका किसी अन्य प्रतिस्पर्धी देश (जैसे चीन या बांग्लादेश) को बेहतर टैरिफ न दे दे, जिससे भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्धा खत्म हो जाए। इसीलिए भारत एक ऐसी व्यवस्था चाह रहा है, जिसमें किसी भी बदलाव के अनुरूप उसे भी उचित राहत मिल सके।

भारत को क्या होगा सीधा फायदा?

अगर यह ट्रेड डील सिरे चढ़ती है, तो भारत को वैश्विक बाजार में बड़ी बढ़त मिलेगी:

आगे का रास्ता

जानकारों का मानना है कि यह डील न केवल व्यापारिक रिश्तों को गति देगी, बल्कि रक्षा, ऊर्जा और टेक्नोलॉजी के क्षेत्रों में दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी को एक नए स्तर पर ले जाएगी। अब नजरें इस पर हैं कि अमेरिका भारत की इन मांगों को किस हद तक स्वीकार करता है, ताकि अंतिम समझौते पर मुहर लग सके।

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