सऊदी अरब की सुरक्षा का अंतिम रक्षक बना पाकिस्तान, सैन्य समझौते से बदले खाड़ी के समीकरण
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रियाद/इस्लामाबाद: खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच पाकिस्तान ने सऊदी अरब की सुरक्षा को लेकर एक बड़ा और कड़ा रुख अपनाया है। पाकिस्तान ने आधिकारिक रूप से ऐलान किया है कि वह सऊदी अरब की रक्षा के लिए अपनी हर उपलब्ध सैन्य क्षमता का इस्तेमाल करने को तैयार है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब क्षेत्र में हूती विद्रोहियों का खतरा लगातार बढ़ रहा है।

सऊदी का दुश्मन, हमारा दुश्मन

पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने रोम में पत्रकारों से बात करते हुए दो टूक शब्दों में कहा कि सऊदी अरब की सुरक्षा पाकिस्तान के लिए सर्वोपरि है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सऊदी अरब के किसी भी दुश्मन को लेकर पाकिस्तान का रुख पूरी तरह से स्पष्ट है। यह बयान दर्शाता है कि दोनों देशों के बीच हुआ नया रक्षा समझौता महज कागजी नहीं है, बल्कि यह जरूरत पड़ने पर सीधी सैन्य कार्रवाई का रास्ता भी खोलता है।

मक्का ज्वाइंट डिफेंस एग्रीमेंट की ताकत

अगस्त में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच हुए मक्का ज्वाइंट डिफेंस एग्रीमेंट ने क्षेत्रीय सुरक्षा का स्वरूप बदल दिया है। इस समझौते के तहत, तीनों में से किसी भी देश पर सशस्त्र हमला होने की स्थिति में, उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। यह एक प्रकार का सामूहिक सुरक्षा कवच है, जो हूती हमलों और ईरान समर्थित गतिविधियों के खिलाफ एक मजबूत दीवार बनाने की कोशिश है।

सैन्य कमांड और खुफिया नेटवर्क पर मंथन

पिछले दिनों रियाद में तीनों देशों के सैन्य प्रमुखों की एक महत्वपूर्ण बैठक हुई थी। इसमें खुफिया जानकारी साझा करने (Intelligence Sharing) और सैन्य समन्वय बढ़ाने पर चर्चा की गई। सूत्रों के मुताबिक, अभी इस गठबंधन के लिए एक सचिवालय और संस्थागत ढांचे को तैयार किया जा रहा है, ताकि आपातकालीन स्थिति में त्वरित प्रतिक्रिया दी जा सके।

हूती हमलों से बढ़ रही है चिंता

रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने चिंता जताई कि यमन के हूती विद्रोही लगातार सऊदी अरब को ड्रोन और मिसाइलों से निशाना बना रहे हैं। हूतियों की लाल सागर और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य जैसे रणनीतिक मार्गों पर बढ़ती पकड़ ने क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा पैदा कर दिया है। पाकिस्तान का मानना है कि इन समुद्री मार्गों की सुरक्षा वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए भी जरूरी है।

दोहरी कूटनीति: समर्थन भी और बातचीत की वकालत भी

दिलचस्प बात यह है कि सैन्य मोर्चे पर सऊदी अरब का साथ देने का ऐलान करने के बावजूद, पाकिस्तान ईरान के साथ तनाव कम करने की वकालत भी कर रहा है। ख्वाजा आसिफ का कहना है कि पाकिस्तान क्षेत्रीय संघर्ष को बातचीत से सुलझाने का समर्थक है। इस्लामाबाद ने पहले भी ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाई है, और अब वह वही कोशिश क्षेत्रीय स्तर पर दोहराना चाहता है।

क्या यह सैन्य गठबंधन खाड़ी में शांति बहाल करेगा या फिर ईरान के साथ तनाव को और अधिक भड़काएगा? इस पर दुनिया भर की नजरें टिकी हुई हैं। फिलहाल, पाकिस्तान ने अपनी भूमिका को सऊदी अरब के रक्षक के रूप में स्पष्ट कर दिया है।

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