IAS की कुर्सी छोड़ी, अब दिव्या मित्तल की जन-नीति : किसी पार्टी का दामन थामे बिना शुरू करेंगी नई पारी
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उत्तर प्रदेश कैडर की पूर्व आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल ने प्रशासनिक सेवा से इस्तीफे के बाद अपनी भावी योजनाओं से पर्दा उठा दिया है। 2013 बैच की इस अधिकारी ने अब राजनीति में कदम रखने का ऐलान किया है, लेकिन उनका अंदाज बिल्कुल अलग होगा।

किसी दल के साथ नहीं, जनता के साथ सफर दिव्या मित्तल ने स्पष्ट कर दिया है कि वह राजनीति में तो आ रही हैं, लेकिन किसी राजनीतिक दल का हिस्सा नहीं बनेंगी। उनका उद्देश्य एक ऐसा मंच तैयार करना है, जो सीधे तौर पर जनता की समस्याओं और उनके सवालों पर आधारित हो। उन्होंने साफ कहा कि वह अपनी राजनीति की शुरुआत उत्तर प्रदेश से करेंगी।

यूपी से खास लगाव अपनी नई पारी के लिए यूपी को ही चुनने के पीछे उन्होंने भावनात्मक कारण बताया। दिव्या ने कहा कि जब वह एक सरकारी अधिकारी बनकर यहां आईं, तो यहां के लोगों ने उन्हें अपने परिवार का हिस्सा माना। इसी भरोसे को कायम रखते हुए वह अब जनसेवा के इस नए रास्ते पर चलेंगी।

मिर्जापुर की एक घटना बनी प्रेरणा अपने प्रशासनिक कार्यकाल का जिक्र करते हुए उन्होंने मिर्जापुर की एक घटना साझा की। वहां एक महिला ने उनसे पेंशन या आवास नहीं, बल्कि अपने गांव में स्कूल की मांग की। दिव्या ने बताया कि स्कूल को मंजूरी मिलने के बाद भी तीन साल तक निर्माण न होना, व्यवस्था की जवाबदेही पर बड़े सवाल खड़े करता है। यही वह दर्द है, जिसे वह अपनी राजनीति का केंद्र बनाना चाहती हैं।

युवाओं के भविष्य और पेपर लीक पर फिक्र अपने संबोधन में उन्होंने युवाओं के भविष्य को लेकर भी गहरी चिंता जताई है। उन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक की समस्या को युवाओं के सपनों के साथ खिलवाड़ बताया। इसके अलावा, उन्होंने भविष्य में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और रोजगार पर पड़ने वाले असर को लेकर भी अपनी राय रखी।

आवाज उठाने का नया जरिया दिव्या मित्तल ने कहा कि राजनीति उनके लिए किसी पद को पाने का जरिया नहीं, बल्कि उन लोगों की आवाज बनने का माध्यम है जिनकी बात सरकारी गलियारों में अनसुनी रह जाती है। उन्होंने लोगों से जुड़ने के लिए एक व्हाट्सएप नंबर (9198956957) भी जारी किया है, ताकि वे जनता के मुद्दों को सीधे समझ सकें।

13 साल की सेवा के बाद फैसला दिव्या मित्तल ने 30 अगस्त 2026 को अपने इस्तीफे की घोषणा की थी, जो 15 सितंबर से प्रभावी हो गया। 13 साल तक प्रशासनिक सेवा में रहने के बाद उनका यह फैसला न केवल चौंकाने वाला था, बल्कि अब चर्चा का विषय भी बना हुआ है। अब देखना यह होगा कि बिना किसी पार्टी के समर्थन के वह जनता के बीच अपनी पैठ कैसे बनाती हैं।

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