UN में नेतन्याहू का फ्रंटल अटैक : तुर्की, ब्रिटेन और फ्रांस पर क्यों भड़के इजराइली पीएम?
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संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का संबोधन तीखे तेवरों और राजनीतिक आरोपों से घिरा रहा। उनके भाषण के दौरान कई देशों के प्रतिनिधियों का हॉल से बाहर जाना विश्व मंच पर इजराइल के प्रति गहराते वैश्विक अलगाव को दर्शाता है। नेतन्याहू ने अपने भाषण में न केवल ईरान को घेरा, बल्कि तुर्की, ब्रिटेन और फ्रांस को भी आड़े हाथों लिया।

तुर्की से सीधा टकराव : एर्दोगन को बताया तानाशाह

नेतन्याहू और तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन के बीच रार पुरानी है, लेकिन अब यह व्यक्तिगत स्तर पर पहुंच गई है। नेतन्याहू ने एर्दोगन पर हमास के नेताओं को पनाह देने और इजराइल के खिलाफ नफरत फैलाने का आरोप लगाया। उन्होंने एर्दोगन को सीधे तौर पर तानाशाह तक कह डाला। तुर्की का रुख स्पष्ट है; वह गाजा में इजराइली सैन्य कार्रवाई को मानवाधिकारों का उल्लंघन मानता है और फिलिस्तीनी अधिकारों के समर्थन में लगातार मुखर है।

ब्रिटेन और फ्रांस से नाराजगी की असली वजह

पश्चिम के पुराने मित्र रहे ब्रिटेन और फ्रांस के साथ इजराइल के संबंध इन दिनों तनावपूर्ण हैं। नेतन्याहू ने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए इन देशों को उपनिवेशवाद की याद दिलाई, ताकि उनकी आलोचना को खारिज किया जा सके। हालांकि, इन देशों की चिंता केवल इतिहास नहीं, बल्कि आज की नीतियां हैं। फिलिस्तीनी नागरिकों की सुरक्षा और गाजा में मानवीय संकट को लेकर लंदन और पेरिस का रुख इजराइल के लिए असहज है।

फिलिस्तीनी राज्य की मान्यता: एक बड़ा कूटनीतिक विवाद

नेतन्याहू की नाराजगी का एक बड़ा कारण फिलिस्तीन को एक स्वतंत्र राज्य के रूप में मान्यता देने की बढ़ती वैश्विक मुहिम है। ब्रिटेन और फ्रांस सहित कई यूरोपीय देश दो-राज्य समाधान (Two-State Solution) की वकालत कर रहे हैं। नेतन्याहू का तर्क है कि ऐसे कदम हमास को पुरस्कृत करने जैसा है, जो इजराइल की सुरक्षा के लिए सीधा खतरा है। इसके विपरीत, समर्थक इसे शांति प्रक्रिया के लिए अनिवार्य मानते हैं।

नरसंहार नहीं, सुरक्षा : नेतन्याहू के दावे

भाषण के दौरान नेतन्याहू ने गाजा में नरसंहार के अंतरराष्ट्रीय आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि इजराइल ने नरसंहार नहीं किया, बल्कि उसे रोका है। 7 अक्टूबर के हमलों का हवाला देते हुए उन्होंने अपनी सैन्य कार्रवाई को देश के अस्तित्व की लड़ाई बताया। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे किसी भी अंतरराष्ट्रीय दबाव के आगे झुकने को तैयार नहीं हैं।

वॉकआउट: कूटनीतिक संदेश या प्रतीकात्मक विरोध?

जब नेतन्याहू बोल रहे थे, तो कई प्रतिनिधियों ने हॉल से बाहर जाकर विरोध जताया। नेतन्याहू ने इसे नैतिक कायरता करार दिया। यह घटनाक्रम बताता है कि संयुक्त राष्ट्र में इजराइल की नीतियों को लेकर मतभेद अब चरम पर हैं। हालांकि, हर देश का विरोध उसके अपने घरेलू हितों और क्षेत्रीय समीकरणों से प्रेरित है।

निष्कर्ष: क्या सुलझेंगे ये मतभेद?

नेतन्याहू का यह भाषण सिर्फ अंतरराष्ट्रीय समुदाय को संदेश नहीं था, बल्कि इजराइल के भीतर अपने समर्थकों के लिए एक शक्ति प्रदर्शन भी था। उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि वे अपनी सुरक्षा नीतियों में बदलाव नहीं करेंगे। वहीं, तुर्की, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे देश गाजा की स्थिति पर लगातार दबाव बनाने की रणनीति अपनाए रहेंगे। कुल मिलाकर, वैश्विक मंच पर इजराइल का कूटनीतिक फ्रंट फिलहाल और अधिक जटिल और तनावपूर्ण होता दिखाई दे रहा है।

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