UNSC में भारत की दावेदारी: बढ़ता वैश्विक समर्थन और चीन की अड़चन
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न्यूयॉर्क में आयोजित संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के 81वें सत्र के दौरान भारत ने एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में स्थायी सदस्यता के लिए अपना पुरजोर दावा पेश किया है। विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती शक्ति और जिम्मेदारी को रेखांकित करते हुए वीटो पावर के साथ स्थायी सीट की मांग दोहराई है।

यूरोप का मिला साथ चीन के कड़े विरोध के बावजूद भारत के लिए राहत की बात यह है कि उसे चार प्रमुख यूरोपीय देशों का साथ मिला है। स्लोवाकिया, पोलैंड, हंगरी और चेक रिपब्लिक (वाइसेग्राड ग्रुप - V4) ने भारत की दावेदारी का खुलकर समर्थन किया है। इसके अलावा फ्रांस जैसे पुराने सहयोगी भी लगातार भारत की स्थायी सदस्यता का पक्ष ले रहे हैं।

वाइसेग्राड ग्रुप (V4) के साथ रणनीतिक तालमेल संयुक्त राष्ट्र महासभा से इतर, विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने V4 देशों के साथ एक उच्च-स्तरीय बैठक की। इसमें रक्षा, तकनीक, कनेक्टिविटी और शिक्षा जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा हुई। संबंधों को और गहरा बनाने के लिए अब भारत और V4 देशों के बीच एक एनुअल बिजनेस फोरम बनाया जाएगा, जिससे व्यापारिक और कूटनीतिक स्तर पर संबंधों को नई मजबूती मिलेगी।

30 सालों से जारी है संघर्ष भारत 1994 से ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अपनी स्थायी जगह बनाने की कोशिश कर रहा है। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने साल 2000 में अंतरराष्ट्रीय मंच पर इस मांग को मजबूती से रखा था। हालांकि, भारत अब तक 8 बार अस्थायी सदस्य (1950 से 2022 के बीच) रह चुका है, लेकिन स्थायी सदस्यता का सपना अब भी अधूरा है।

चीन का वीटो और भारत की हठ 1945 में स्थापित UNSC में 1965 के बाद से कोई बड़ा विस्तार नहीं हुआ है। भारत की राह में सबसे बड़ा रोड़ा चीन बना हुआ है, जो बार-बार अपने वीटो पावर का इस्तेमाल कर भारत की राह में बाधा डालता है। बावजूद इसके, भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह ग्लोबल साउथ की आवाज बनकर वैश्विक सुधारों के लिए अपना दावा पेश करना जारी रखेगा।

क्यों अहम है भारत की दावेदारी? विशेषज्ञों का मानना है कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों में भारत की भूमिका अहम है। दुनिया भर में शांति स्थापना (Peacekeeping) अभियानों में भारत का योगदान और वैश्विक मुद्दों पर तटस्थ और संतुलित राय उसे एक जिम्मेदार महाशक्ति के रूप में स्थापित करती है। भारत का तर्क है कि आधुनिक दुनिया की वास्तविकताओं को देखते हुए सुरक्षा परिषद में सुधार अनिवार्य हैं।

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