बिहार में महिला सुरक्षा पर जमुई का तमाचा: 10 साल में 97% बढ़े अपराध, क्या वाकई सुरक्षित हैं बेटियां?
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बिहार में महिला सुरक्षा हमेशा से राजनीतिक बहस का केंद्र रही है, लेकिन जमुई की हालिया घटना ने इन दावों की पोल खोल दी है। 19 सितंबर की शाम कोचिंग से लौट रही 10वीं की छात्रा और उसके दोस्त के साथ सरेआम हुई बदसलूकी का वीडियो न केवल विचलित करने वाला है, बल्कि यह राज्य की कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल भी खड़े करता है।

जमुई में क्या हुआ था? 19 सितंबर को मड़वा पहाड़ इलाके में स्कूटी सवार दो नाबालिग छात्र-छात्राओं को कुछ युवकों ने रोक लिया। सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो में छात्रा को बदसलूकी और मारपीट का शिकार होते देखा जा सकता है। एक युवक उसे जबरन खींचने की कोशिश भी कर रहा है। मामले के तूल पकड़ने के बाद पुलिस ने FIR दर्ज कर तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया है और SIT का गठन किया गया है। लेकिन अहम सवाल यह है कि क्या सिर्फ कैमरों में कैद मामलों में ही कार्रवाई होगी?

10 सालों में 97% बढ़ा अपराध का ग्राफ NCRB के आंकड़े बताते हैं कि बिहार में महिलाओं के खिलाफ अपराधों में भारी उछाल आया है। साल 2014 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 15,393 मामले दर्ज थे, जो 2024 तक बढ़कर 27,359 हो गए। यह पिछले एक दशक में करीब 96.8% की भयावह वृद्धि है।

देश में छठे नंबर पर बिहार महिला अपराध के कुल दर्ज मामलों में बिहार देश के शीर्ष राज्यों में शामिल है। 2024 के आंकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश (66,398) पहले स्थान पर है, जबकि बिहार 27,359 मामलों के साथ छठे नंबर पर है।

इस आंकड़े में सबसे भयावह पहलू यह है कि इसमें अपहरण और बहला-फुसलाकर ले जाने के मामले (12,438) सबसे अधिक हैं। इसके अलावा रेप के 1,165 और दहेज हत्या के 1,078 मामले दर्ज किए गए हैं, जो राज्य की सामाजिक स्थिति को दर्शाते हैं।

राजनीतिक घमासान: गुंडाराज का आरोप जमुई कांड के बाद बिहार में सियासी पारा चढ़ गया है। विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने राज्य में गुंडाराज का आरोप लगाते हुए कहा कि आज बिहार में महिलाएं और बच्चियां कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं। वहीं, जनशक्ति जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष तेज प्रताप यादव ने सरकार को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराते हुए आंदोलन की चेतावनी दी है।

नजरिया: क्या बदलेगा? जमुई की घटना केवल एक अपराध नहीं, बल्कि एक आईना है। राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी इस पर स्वतः संज्ञान लिया है। फिलहाल पुलिस कार्रवाई की बात कह रही है, लेकिन असल चुनौती यह है कि जिस राज्य में अपराध दर इतनी तेजी से बढ़ रही हो, वहां प्रशासनिक सख्ती केवल घटनाओं के वायरल होने तक ही सीमित न रहे। क्या बिहार अपनी बेटियों को वो सुरक्षा दे पाएगा जिसका वादा हर चुनाव के बाद किया जाता है? यह सवाल अब सिर्फ फाइलों में नहीं, बिहार की सड़कों पर गूंज रहा है।

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