नई दिल्ली: कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजित डोभाल पर लगाए गए फोन टैपिंग के गंभीर आरोपों ने देश की राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है। राहुल गांधी का दावा है कि देश के करोड़ों लोगों के फोन, वॉट्सऐप और फेसबुक डेटा पर सरकार नजर रख रही है।
राहुल गांधी का बड़ा आरोप 19 सितंबर को इंदौर में एक कार्यक्रम के दौरान राहुल गांधी ने दावा किया कि अजित डोभाल के पास देश के संचार माध्यमों की पूरी जानकारी है। राहुल ने आरोप लगाया कि फोन टैपिंग के जरिए जो भी डेटा जुटाया जाता है, उसे सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह तक पहुंचाया जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि डोभाल कथित तौर पर देश के कुछ चुनिंदा लोगों को नियंत्रित भी करते हैं।
पूर्व जासूस का करारा जवाब राहुल गांधी के इन दावों को पूर्व खुफिया अधिकारी लकी बिष्ट ने सिरे से खारिज कर दिया है। बिष्ट ने एक वीडियो जारी कर कहा कि 140 करोड़ लोगों का फोन टैप करना न केवल तकनीकी रूप से असंभव है, बल्कि इसके लिए इतने बड़े मानव संसाधन की कल्पना करना भी बेमानी है। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता को गुमराह कर रहे हैं।
सुरक्षा प्रोटोकॉल का हिस्सा है निगरानी लकी बिष्ट ने साफ किया कि सुरक्षा एजेंसियां देश की संप्रभुता और शांति बनाए रखने के लिए केवल चुनिंदा संदिग्धों पर नजर रखती हैं। यह व्यवस्था देश में नई नहीं है, बल्कि दशकों से चली आ रही है। अगर कोई व्यक्ति विदेशी खुफिया एजेंसियों के साथ जुड़ा है या देश के खिलाफ साजिश रच रहा है, तो उसकी निगरानी करना सुरक्षा प्रोटोकॉल का अनिवार्य हिस्सा है।
अजित डोभाल की साख पर सवाल? बिष्ट ने अजित डोभाल के रिकॉर्ड का बचाव करते हुए 1989 के कीर्ति चक्र का जिक्र किया। उन्होंने याद दिलाया कि जब देश में राजीव गांधी की सरकार थी, तब ऑपरेशन ब्लैक थंडर में बहादुरी दिखाने के लिए अजित डोभाल को सम्मानित किया गया था। उन्होंने तर्क दिया कि खुफिया तंत्र का इस्तेमाल हमेशा राष्ट्रहित के लिए किया गया है, न कि किसी व्यक्ति विशेष की निजी जासूसी के लिए।
क्या कहते हैं कानून के नियम? भारत में फोन टैपिंग या किसी भी प्रकार की निगरानी मनमाने तरीके से नहीं की जा सकती। भारतीय टेलीग्राफ अधिनियम के तहत इसके लिए सख्त कानूनी प्रक्रिया और केंद्रीय गृह सचिव स्तर की मंजूरी अनिवार्य है। सुप्रीम कोर्ट ने भी निजता के अधिकार (Right to Privacy) को मौलिक अधिकार माना है, जिसके तहत सरकार को निगरानी के लिए वैध कारण और सुरक्षा उपाय अपनाने पड़ते हैं।
निष्कर्ष फिलहाल राहुल गांधी के आरोपों की कोई स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि सुरक्षा एजेंसियां शून्य-सहिष्णुता की नीति अपनाते हुए संदिग्धों पर नजर रखती हैं, लेकिन इसे पूरे देश की निगरानी बताना तथ्यों से परे है। अब देखना यह होगा कि इस राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला कहां जाकर थमता है।
*आप ही बताइए, क्या ये मुमकिन है कि हिंदुस्तान के 140 करोड़ लोगों के फ़ोन टैप किए जा सकें? 🤔
— Lucky Bisht (@iamluckybisht) September 20, 2026
अगर फ़ोन टैप हो भी रहे हैं, तो उन्हें सुनने के लिए इंसान भी तो चाहिए। क्या हमारे देश के पास इतने लोग हैं कि हर फ़ोन की हर बातचीत सुन सकें? सोचिए, 140 करोड़ लोग और रोज़ करोड़ों कॉल!
हाँ,… pic.twitter.com/VPcecrHYzI
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