हामिद अंसारी के बयान पर छिड़ा विवाद: क्या ‘हिंदू दक्षिणपंथ’ पर टिप्पणी से नाराज हुए मुस्लिम नेता?
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भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति मोहम्मद हामिद अंसारी अपने हालिया बयान को लेकर विवादों के घेरे में हैं। दिल्ली में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने देश में ‘हिंदू दक्षिणपंथी सांप्रदायिकता’ को बड़ा खतरा बताया, जिसके बाद राजनीतिक गलियारों में विरोध की लहर दौड़ गई है। हैरानी की बात यह है कि उनके इस बयान से केवल बीजेपी ही नहीं, बल्कि मुस्लिम समाज के भी कई नेता नाराज हैं।

क्या है पूरा मामला? अंसारी दिल्ली के इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर में एजी नूरानी की किताब ‘द RSS: अ मेनेस टू इंडिया’ पर चर्चा कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के एक पुराने बयान का हवाला दिया। अंसारी ने कहा कि नेहरू ने चेतावनी दी थी कि भारत के लिए असली खतरा कम्युनिज्म से नहीं, बल्कि हिंदू दक्षिणपंथी सांप्रदायिकता से था। उनके इसी उल्लेख ने राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया है।

बीजेपी नेताओं का कड़ा रुख बीजेपी नेता सैयद शाहनवाज हुसैन ने हामिद अंसारी के बयान को ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ करार दिया है। उन्होंने कहा कि एक मुस्लिम परिवार में जन्म लेने और देश के उपराष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च पद तक पहुंचने के बावजूद, ऐसे बयान देना शोभा नहीं देता। हुसैन ने साफ कहा कि इस टिप्पणी से देश के मुस्लिम समुदाय के लोग भी आहत हैं और अंसारी को इसके लिए माफी मांगनी चाहिए।

‘बंटवारे का एजेंडा सफल नहीं होगा’ वहीं, पूर्व केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने भी कड़ी प्रतिक्रिया दी है। नकवी ने कहा कि विभाजन के बाद भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बना, जहाँ विभिन्न धर्मों के लोग सदियों से मिल-जुलकर रह रहे हैं। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि जो लोग समाज में मतभेद और बंटवारा पैदा करने की कोशिश करेंगे, वे अपने मंसूबों में कभी कामयाब नहीं होंगे।

‘दंगामुक्त माहौल है देश में’ शाहनवाज हुसैन ने आगे जोर देते हुए कहा कि आज भारत ‘सबका साथ, सबका विकास’ के विजन के साथ आगे बढ़ रहा है। उन्होंने दावा किया कि वर्तमान में मुस्लिम समुदाय के लोग शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं में बेहतरीन प्रदर्शन कर रहे हैं और देश के नागरिक एक शांतिपूर्ण और दंगा-मुक्त माहौल में रह रहे हैं।

फिलहाल, हामिद अंसारी के इस बयान पर मची खलबली थमने का नाम नहीं ले रही है। सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक मंचों तक लोग इस बात पर बहस कर रहे हैं कि क्या एक संवैधानिक पद पर रह चुके व्यक्ति का ऐसा बयान समाज में ध्रुवीकरण को बढ़ावा देने वाला है।

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