गड़चिरोली के जंगलों में दांव पर बच्चों का भविष्य: स्कूल है पर शिक्षक नहीं, बाघों के साए में पढ़ने को मजबूर बेटियां
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गड़चिरोली जिले के एटापल्ली तहसील में सरकारी शिक्षा व्यवस्था के खोखले वादों की पोल खुल गई है। कॉक्रोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संस्थापक अभिजीत दिपके ने जब जमीनी हकीकत का जायजा लिया, तो आदिवासी छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ की भयावह तस्वीर सामने आई।

बाघों के डर के बीच जानलेवा सफर कोसा आलेंगा गांव में स्कूल की इमारत तो है, लेकिन वहां एक भी शिक्षक नहीं है। नतीजतन, गांव की तीन छात्राओं को रोज दो किलोमीटर का जोखिम भरा रास्ता तय कर कोहका स्कूल जाना पड़ता है। यह रास्ता घने जंगलों से होकर गुजरता है, जहाँ बाघ, सांप और अन्य हिंसक जानवरों का हर पल खतरा बना रहता है। इस बदहाल स्थिति ने बच्चों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

डुम्मे स्कूल: कागजों पर स्कूल, हकीकत में अव्यवस्था डुम्मे स्थित जिला परिषद प्राथमिक स्कूल की हालत भी कुछ अलग नहीं है। पहली से आठवीं कक्षा तक 57 छात्र हैं, लेकिन उन्हें पढ़ाने के लिए केवल दो शिक्षक और एक प्रधानाध्यापक है। निरीक्षण के दौरान यह चौंकाने वाली बात सामने आई कि छात्रों के लिए कक्षाओं में पंखे तक नहीं हैं, लेकिन प्रशासनिक कार्यालय में पंखा लगा हुआ है। 2023 में ही स्कूल भवन को जर्जर घोषित करने का प्रस्ताव भेजा गया था, लेकिन प्रशासन ने अब तक सुध नहीं ली है।

दिखावटी इंतजामों का खेल प्रशासनिक संवेदनहीनता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दिपके के दौरे से ठीक एक दिन पहले स्कूल में पेयजल के लिए नल की व्यवस्था की गई। अभिजीत दिपके ने कड़ा रुख अपनाते हुए पूछा कि, अगर एक दिन में नल लग सकता है, तो इसके लिए दो साल का इंतजार क्यों कराया गया? उन्होंने कोसा आलेंगा में भी निरीक्षण से पहले ग्रामसेवक द्वारा आनन-फानन में स्कूल की सफाई कराए जाने का दावा किया है।

कोहका स्कूल में एक कमरे में चार कक्षाएं कोहका स्कूल में 27 बच्चों को पढ़ाने के लिए सिर्फ दो शिक्षक हैं। जगह की भारी कमी के कारण पहली से चौथी कक्षा तक के बच्चों को एक ही कमरे में बैठकर पढ़ने को मजबूर होना पड़ रहा है।

कौन लेगा जिम्मेदारी? अभिजीत दिपके ने प्रशासन से सीधा सवाल किया कि यदि स्कूल आते-जाते किसी बच्चे पर वन्यजीव हमला करता है, तो इसका जिम्मेदार कौन होगा? उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि यदि किसी मंत्री या अधिकारी का बच्चा ऐसी असुरक्षित परिस्थितियों में पढ़ रहा होता, तो क्या प्रशासन का रवैया यही रहता? यह दौरा आदिवासी बहुल क्षेत्रों में बुनियादी शिक्षा और सुरक्षा के दावों को पूरी तरह खारिज करता है।

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