ख्वाजा आसिफ का यू-टर्न: 1965 की जंग पर रक्षा मंत्री के विरोधाभासी बयानों से घिरी पाकिस्तान सरकार
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पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ अपने ही पुराने बयानों के जाल में फंस गए हैं। 1965 की भारत-पाकिस्तान जंग को लेकर उनके हालिया दावे और 20 साल पुराने संसदीय भाषण में जमीन-आसमान का अंतर है, जिसे लेकर सोशल मीडिया पर उनकी जमकर आलोचना हो रही है।

क्या कहा रक्षा मंत्री ने? हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान ख्वाजा आसिफ ने 1965 की लड़ाई को पाकिस्तान के लिए गौरवशाली बताया। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति अय्यूब खान के दौर को सुनहरे अक्षरों में याद करते हुए दावा किया कि पाकिस्तान ने दुश्मन के इलाके में घुसकर लड़ाई लड़ी। उन्होंने इसे पाकिस्तान की बड़ी सैन्य उपलब्धि के रूप में पेश करने की कोशिश की।

पुराना सच: जब संसद में कबूली थी हार वही ख्वाजा आसिफ करीब दो दशक पहले पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में बिल्कुल अलग सुर में बात कर रहे थे। एक वायरल वीडियो में उन्हें यह कहते हुए सुना जा सकता है, पाकिस्तान की सेना ने कभी कोई जंग नहीं जीती। जब भी सेना मैदान में उतरी, उसे हार का मुंह देखना पड़ा। उन्होंने 1948, 1965, 1971 और कारगिल युद्ध का जिक्र करते हुए कहा था कि अगर इन लड़ाइयों की निष्पक्ष जांच हो, तो देश को शर्मिंदगी झेलनी पड़ेगी।

इतिहास के पन्नों में क्या दर्ज है? 1965 की जंग का इतिहास अक्सर पाकिस्तान के लिए विवादित रहा है। अमेरिकी विदेश विभाग के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, यह युद्ध कश्मीर में घुसपैठ की पाकिस्तानी कोशिशों के बाद शुरू हुआ था। युद्ध के अंत में ताशकंद समझौते के जरिए स्थिति को नियंत्रित किया गया, जिसे कई विश्लेषक पाकिस्तान की कूटनीतिक और सैन्य विफलता के रूप में देखते हैं।

बदले बयानों पर सवाल सवाल यह है कि जो व्यक्ति एक समय संसद के पटल पर अपनी सेना के रिकॉर्ड को शर्मनाक बता रहा था, वही आज उसी इतिहास को गौरव कैसे बता सकता है? आलोचकों का कहना है कि ख्वाजा आसिफ का यह यू-टर्न केवल राजनीतिक लाभ लेने और जनता का ध्यान भटकाने की एक कोशिश है।

इस विरोधाभास ने न केवल ख्वाजा आसिफ की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि पाकिस्तान के सैन्य इतिहास को लेकर वहां की सत्ता के दोहरे मापदंडों को भी दुनिया के सामने उजागर कर दिया है।

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