यूनाइटेड किंगडम (UK) में अलगाव की सुगबुगाहट अब एक गंभीर राजनीतिक चर्चा में बदल गई है। पीएम एंडी बर्नहम का यह बयान कि यदि स्कॉटलैंड में जनमत संग्रह के लिए स्पष्ट सहमति बनती है, तो उनकी सरकार इसमें बाधा नहीं डालेगी, ब्रिटिश राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ माना जा रहा है। इस बयान के बाद सवाल उठने लगे हैं कि क्या वाकई यूनाइटेड किंगडम के टुकड़े होने वाले हैं?
अक्सर लोग यूनाइटेड किंगडम और ग्रेट ब्रिटेन को एक ही समझ लेते हैं, लेकिन इनमें तकनीकी अंतर है। यूनाइटेड किंगडम चार देशों का समूह है: इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड। इनमें से इंग्लैंड, स्कॉटलैंड और वेल्स को मिलाकर ग्रेट ब्रिटेन बनता है, और जब इसमें उत्तरी आयरलैंड जुड़ता है, तब यह यूनाइटेड किंगडम का स्वरूप लेता है।
आज यूनाइटेड किंगडम का कुल क्षेत्रफल लगभग 2,42,749 वर्ग किलोमीटर है। इसमें इंग्लैंड की हिस्सेदारी करीब 54 फीसदी है। यदि बाकी तीन देश अलग होते हैं, तो इंग्लैंड का क्षेत्रफल घटकर 1,30,309 वर्ग किलोमीटर रह जाएगा। यानी इंग्लैंड अपनी लगभग 46 फीसदी जमीन खो देगा। हालांकि, अपनी 5.8 करोड़ की आबादी के साथ इंग्लैंड के पास यूके की कुल जनसंख्या का 84 फीसदी हिस्सा बना रहेगा, जिससे जनसांख्यिकीय रूप से उसे बड़ा झटका नहीं लगेगा।
आर्थिक मोर्चे पर इंग्लैंड पहले से ही यूनाइटेड किंगडम का इंजन रहा है। यूके की कुल जीडीपी का 85 से 90 फीसदी हिस्सा अकेले इंग्लैंड से आता है। दुनिया का प्रमुख वित्तीय केंद्र लंदन भी इसी का हिस्सा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अलगाव के बाद अलग होने वाले देशों को आर्थिक संघर्ष करना पड़ सकता है, जबकि इंग्लैंड दुनिया की शीर्ष 10 अर्थव्यवस्थाओं में अपना रुतबा बरकरार रखेगा।
सैन्य शक्ति और परमाणु हथियारों की कमान लंबे समय से लंदन के हाथों में है। विभाजन के बाद भी इंग्लैंड ही सेना और परमाणु शक्ति का मुख्य उत्तराधिकारी होगा। साथ ही, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में यूके की स्थायी वीटो सीट भी रूस की तर्ज पर इंग्लैंड के पास रहने की प्रबल संभावना है।
हालांकि, इंग्लैंड के सामने एक बड़ी चुनौती होगी—स्कॉटलैंड के फासलेन बेस पर तैनात परमाणु पनडुब्बियों को हटाना। स्कॉटलैंड के अलग होने पर इंग्लैंड को अपने नेवल बेस को शिफ्ट करने में भारी-भरकम खर्च उठाना पड़ेगा।
स्कॉटलैंड के नेता जॉन स्विनी ने पीएम बर्नहम के बयान का स्वागत किया है। उन्होंने इसे एक बड़ी जीत बताते हुए कहा कि 2014 के बाद पहली बार किसी ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने यह स्वीकार किया है कि स्कॉटलैंड का भविष्य वहां की जनता तय करेगी, न कि लंदन में बैठी सरकार।
प्रधानमंत्री का यह लचीला रुख उन अलगाववादी ताकतों के लिए संजीवनी बन गया है जो लंबे समय से स्वतंत्रता की मांग कर रहे थे। यदि यूनाइटेड किंगडम वास्तव में बिखरता है, तो यह वैश्विक राजनीति के नक्शे में एक बड़ा बदलाव होगा। हालांकि, इंग्लैंड अपने दम पर एक मजबूत और संपन्न राष्ट्र के रूप में खड़ा रहने में सक्षम है।
To go from “off limits” to this is an acceptance of the reality that the people of Scotland will decide their own future - not the UK Government.
— John Swinney (@JohnSwinney) September 9, 2026
For the first time since 2014, a British Prime Minister accepts that majority support for a referendum should mean one takes place. pic.twitter.com/2DB9AuAybp
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