सत्य निकेतन हादसे के बाद जागा सुप्रीम कोर्ट: क्या अब देशभर के PG और हॉस्टलों की होगी जांच?
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दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में हाल ही में हुए दर्दनाक PG बिल्डिंग हादसे, जिसमें 7 छात्रों की मौत हो गई, ने अब पूरे देश की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए इसे सिर्फ दिल्ली तक सीमित न रखने और पूरे भारत में हॉस्टलों की सुरक्षा ऑडिट करने के संकेत दिए हैं।

सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने स्पष्ट किया कि सुरक्षा का यह मुद्दा पैन-इंडिया (Pan-India) स्तर का है। अदालत ने कहा कि उनके मन में इस विषय को लेकर एक ठोस योजना है। कोर्ट दिल्ली हाई कोर्ट में लंबित जनहित याचिका (PIL) को अपने पास ट्रांसफर करने पर विचार कर रही है ताकि पूरे देश में अवैध और असुरक्षित निर्माणों के खिलाफ एक बड़ा अभियान चलाया जा सके।

सुरक्षा पर उठे गंभीर सवाल सत्य निकेतन हादसे ने उन हजारों निजी PG और हॉस्टलों की पोल खोल दी है, जो बिना किसी नक्शे, फायर सेफ्टी और स्ट्रक्चरल ऑडिट के चल रहे हैं। कोर्ट में एमिकस क्यूरी और वरिष्ठ अधिवक्ता अजीत कुमार सिन्हा ने मांग की है कि छात्रों के रहने वाले सभी आवासीय भवनों की तत्काल स्ट्रक्चरल ऑडिट कराई जानी चाहिए।

क्या दिल्ली हाई कोर्ट की जांच काफी है? दिल्ली हाई कोर्ट पहले ही मामले की सुनवाई कर रहा है और उसने MCD को उच्च-स्तरीय जांच का आदेश दिया है। कोर्ट यह पता लगाने की कोशिश कर रहा है कि क्या इमारत के पास निर्माण की अनुमति थी और इस लापरवाही के लिए कौन-कौन से अधिकारी जिम्मेदार हैं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि यह समस्या केवल एक शहर की नहीं, बल्कि देशभर की है।

इतिहास गवाह है: पहले भी हो चुकी है नाराजगी साकेत में इमारत गिरने और मालवीय नगर में आग जैसी घटनाओं के बाद सुप्रीम कोर्ट पहले भी प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल उठा चुका है। अदालत ने पहले ही अधिकारियों को चेतावनी दी थी कि लापरवाही होने पर उनकी व्यक्तिगत जवाबदेही तय की जाएगी। इसके बावजूद, नियमों का उल्लंघन जारी है।

NHRC ने भी मांगी कार्ययोजना सिर्फ कोर्ट ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने भी इस पर कड़ा रुख अपनाया है। आयोग ने दिल्ली सरकार और UGC को निर्देश दिया है कि वे छात्रों के लिए सुरक्षित और किफायती आवासों की कमी को दूर करने के लिए एक समयबद्ध योजना तैयार करें। यह काम केवल दिल्ली विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं, बल्कि अन्य शैक्षणिक केंद्रों के लिए भी होना चाहिए।

आने वाले दिनों में सुप्रीम कोर्ट का फैसला देशभर के उन लाखों छात्रों के लिए एक बड़ा राहत या सुरक्षा कवच साबित हो सकता है, जो अनधिकृत और जर्जर इमारतों में रहने को मजबूर हैं।

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