सत्य निकेतन में हाल ही में हुई इमारत गिरने की घटना ने पूरे इलाके को दहला दिया है। मलबे में छात्रों समेत कई लोगों के दबे होने की खबर ने न केवल डर फैलाया, बल्कि राहत और बचाव कार्यों की तैयारियों की पोल भी खोल दी है।
45 मिनट बनाम 10 मिनट का अंतर इस हादसे की सबसे चिंताजनक बात सरकारी सिस्टम की सुस्ती रही। चश्मदीदों और स्थानीय लोगों का दावा है कि सरकारी एम्बुलेंस को घटनास्थल तक पहुंचने में करीब 45 मिनट का लंबा समय लगा। वहीं, दूसरी ओर ब्लिंकिट (Blinkit) की एम्बुलेंस मात्र 10 मिनट के भीतर वहां पहुंच गई। सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि निजी कंपनी ने बिना किसी शुल्क के अपनी तत्परता दिखाई।
छात्रों ने निभाई जिम्मेदारी मुश्किल की इस घड़ी में NSUI और दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) के छात्र मसीहा बनकर सामने आए। प्रशासनिक मदद के इंतजार में समय बर्बाद करने के बजाय, छात्रों ने खुद ही बचाव कार्य में हाथ बंटाना शुरू कर दिया। छात्रों का यह जज्बा काबिल-ए-तारीफ है, लेकिन व्यवस्था के लिए यह एक तमाचे जैसा है।
कीमती मिनटों का मोल कौन चुकाएगा? आपातकालीन स्थिति में एक-एक मिनट जिंदगी और मौत का अंतर तय करता है। जब मलबे के नीचे लोगों की सांसें अटकी हों, तब 35 मिनट की देरी किसी के लिए जानलेवा साबित हो सकती है। अगर एक निजी संस्था सरकारी तंत्र से कई गुना तेज पहुंच सकती है, तो सरकारी एम्बुलेंस और बचाव दल की कार्यशैली पर सवाल उठना लाजमी है।
सिस्टम के सुधार की दरकार यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर कब तक हम हादसों के बाद इसी तरह सिस्टम की खामियों को कोसते रहेंगे? क्या हमारी आपातकालीन तैयारियां सिर्फ कागजों तक सीमित हैं?
जरूरत सिर्फ हादसे के बाद जांच बिठाने की नहीं, बल्कि एक ऐसी रिस्पॉन्स टीम तैयार करने की है जो चुस्त, जिम्मेदार और हर स्थिति के लिए चौबीस घंटे तैयार रहे। हमें ऐसी व्यवस्था चाहिए, जहां जीवन बचाने के लिए निजी कंपनियों की ओर न देखना पड़े।
सत्य निकेतन में इमारत गिरने की घटना बेहद दुखद है !
— Rebellious 2.0🕊️ (@RebelliousPari8) September 7, 2026
सबसे चिंता की बात है कि मलबे में छात्रों समेत कई लोगों के दबे होने की खबर है
और व्यवस्था ऐसी की सरकारी एम्बुलेंस को पहुंचने में करीब 45 मिनट लगे
जबकि Blinkit की एम्बुलेंस 10 मिनट में पहुंच गई और वो भी बिना किसी शुल्क के
NSUI… pic.twitter.com/OS0NRw6MH8
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