मलबे से निकली DU की सियासत: डीयू चुनाव से पहले सत्य निकेतन हादसा बना बड़ा राजनीतिक अखाड़ा
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सत्य निकेतन में मौत का तांडव दिल्ली के सत्य निकेतन में रविवार को हुआ इमारत हादसा अब एक बड़ी राजनीतिक जंग में बदल चुका है। इस हादसे में अब तक 7 लोगों की जान जा चुकी है, जबकि 12 लोगों को मलबे से सुरक्षित बाहर निकाला गया है। बचाव कार्य अभी भी जारी है, लेकिन कैंपस की सियासत में इस हादसे ने उबाल ला दिया है।

चुनाव और मलबे का कनेक्शन यह घटना ऐसे समय में हुई है जब दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (DUSU) के चुनाव सिर पर हैं। 18 सितंबर को मतदान होना है। घटनास्थल पर बड़ी संख्या में डीयू के छात्र रहते हैं, इसलिए एनएसयूआई (NSUI) और एबीवीपी (ABVP) जैसे बड़े छात्र संगठन अपनी सक्रियता दिखाने के लिए तुरंत मौके पर पहुंच गए।

एनएसयूआई का आरोप और सवाल एनएसयूआई के कार्यकर्ता सबसे पहले मौके पर पहुंचे। संगठन के अध्यक्ष विनोद जाखड़ ने मलबे के बीच बचाव कार्य में मदद की और गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि हादसे का शिकार हुई बिल्डिंग का संबंध एक भाजपा विधायक से है। साथ ही, उन्होंने इलाके में चल रहे अवैध पीजी और लचर निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े किए।

एबीवीपी की आक्रामकता, एमसीडी ऑफिस में तोड़फोड़ दूसरी तरफ, एबीवीपी ने इस हादसे को प्रशासनिक नाकामी बताया। संगठन के कार्यकर्ताओं ने सिविक सेंटर स्थित एमसीडी कार्यालय के बाहर जमकर प्रदर्शन किया और एमसीडी कमिश्नर के इस्तीफे की मांग की। विरोध के दौरान कार्यालय में तोड़फोड़ भी हुई, जिसने मामले को और गरमा दिया है।

चुनाव प्रचार में बड़ा मुद्दा बनेगा छात्र सुरक्षा चुनाव नामांकन से ठीक पहले हुई इस घटना ने कैंपस की राजनीति को बदल दिया है। विश्लेषकों का मानना है कि अब छात्र सुरक्षा , अवैध पीजी पर लगाम और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे मुद्दे चुनाव प्रचार के केंद्र में होंगे। हर संगठन यह साबित करने की कोशिश में है कि संकट के समय कौन छात्रों के साथ खड़ा रहा।

कानूनी कार्रवाई तेज हादसे को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में आज सुनवाई हो रही है। पुलिस ने बिल्डिंग मालिक हरिराम (हरिओम बंसल) को पकड़ने के लिए 10 विशेष टीमें गठित की हैं और उनके खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी किया गया है। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने भी हादसों को रोकने के लिए नई नीति बनाने का बड़ा ऐलान किया है। अब देखना यह है कि क्या यह सियासी शोर छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित कर पाएगा या चुनाव के साथ ही थम जाएगा।

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