बेबुनियाद और गलत : ISRO ने निजीकरण की अफवाहों पर तोड़ी चुप्पी, जानिए क्या है सच?
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भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने अपनी साख और भविष्य को लेकर चल रही अटकलों पर पूर्ण विराम लगा दिया है। बीते कुछ दिनों से सोशल मीडिया और गलियारों में चर्चा थी कि इसरो का निजीकरण किया जा रहा है। अब स्पेस एजेंसी ने इन दावों को सिरे से खारिज करते हुए इसे पूरी तरह गलत बताया है।

निजीकरण नहीं, इकोसिस्टम का विस्तार ISRO ने स्पष्ट किया है कि एजेंसी का न तो निजीकरण होगा और न ही उसकी भूमिका में कोई कटौती की जाएगी। एजेंसी के अनुसार, निजी क्षेत्र, स्टार्टअप्स और शिक्षण संस्थानों की भागीदारी को इसरो के कमजोर होने के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। इसे भारत के पूरे अंतरिक्ष इकोसिस्टम के विस्तार और मजबूती के रूप में देखना चाहिए।

लीडिंग एजेंसी बनी रहेगी ISRO अपने आधिकारिक बयान में इसरो ने कहा कि वह भविष्य में भी उन्नत अंतरिक्ष अनुसंधान, तकनीकी विकास और रणनीतिक मिशनों की कमान संभाले रखेगी। भारत के महत्वपूर्ण अंतरिक्ष अभियान, जिनमें वैज्ञानिक खोज और तकनीकी नवाचार शामिल हैं, उनमें इसरो की भूमिका पहले की तरह ही सर्वोपरि बनी रहेगी।

स्पेस विजन 2047 का बड़ा लक्ष्य इसरो ने अपने भविष्य के रोडमैप का जिक्र करते हुए कहा कि ये सुधार स्पेस विजन 2047 का हिस्सा हैं। भारत के महत्वाकांक्षी लक्ष्यों में 2035 तक भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन की स्थापना, 2040 तक चंद्रमा पर भारतीय अंतरिक्ष यात्री को भेजना और अगली पीढ़ी के रियूजेबल लॉन्च सिस्टम का विकास करना शामिल है। इन बड़े सपनों को पूरा करने के लिए ही साझेदारी को बढ़ावा दिया जा रहा है।

विवाद की जड़ क्या है? यह पूरा विवाद जुलाई में शुरू हुआ था, जब इसरो के कई वैज्ञानिकों के इस्तीफे की खबरें सामने आईं। इसके बाद सरकार को दखल देना पड़ा। इस हलचल के बीच, इसरो के कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व करने वाले नौ संगठनों ने चेयरमैन वी. नारायणन को पत्र लिखकर अपनी चिंताएं जाहिर की थीं। उनका मानना था कि नई प्रस्तावित नीतियों से रोजगार और एजेंसी की स्वायत्तता पर असर पड़ सकता है।

इसी दबाव और असमंजस के बीच, इसरो ने अब आधिकारिक तौर पर स्थिति साफ कर दी है कि संस्थान के निजीकरण की कोई योजना नहीं है।

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