टाटा केमिकल्स बंद होते ही सड़क पर आया केन्या का यह शहर, पानी-इलाज के लिए मची त्राहि
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नई दिल्ली: केन्या का मगाडी शहर इन दिनों भीषण मानवीय और आर्थिक संकट से जूझ रहा है। टाटा समूह की कंपनी टाटा केमिकल्स मगाडी का कामकाज अनिश्चित काल के लिए बंद होते ही इस शहर की कमर टूट गई है। मगाडी की अर्थव्यवस्था जिस तरह इस एक कंपनी पर टिकी थी, उसके बंद होते ही वहां का ढांचा पूरी तरह चरमरा गया है।

रोज़गार और अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रहार मगाडी के 95% लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से टाटा केमिकल्स पर निर्भर थे। कंपनी बंद होने से न केवल कर्मचारियों की नौकरी छूटी, बल्कि उन कॉन्ट्रैक्टर्स का काम भी ठप हो गया जो स्थानीय स्तर पर अर्थव्यवस्था को गति दे रहे थे। आज स्थिति यह है कि लोगों के पास पैसे का लेन-देन लगभग खत्म हो गया है और पूरा शहर आर्थिक तंगी की चपेट में है।

अस्पताल आने से कतरा रहे मरीज इलाके के एक डॉक्टर ने चिंता जताते हुए कहा कि अस्पताल में मरीजों की संख्या में भारी गिरावट आई है। हालांकि अस्पताल नॉन-प्रॉफिट आधारित है, लेकिन लोग अब अपना इलाज कराने के लिए भी पैसे जुटाने में असमर्थ हैं। लोग तभी डॉक्टर के पास पहुंच रहे हैं जब उनकी बीमारी बर्दाश्त से बाहर हो जाती है। बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं तक लोगों की पहुंच कम होना एक गंभीर सामाजिक संकट का संकेत है।

पानी के लिए 16 किलोमीटर का संघर्ष टाटा केमिकल्स का कामकाज रुकने का सबसे भयावह असर पानी की सप्लाई पर पड़ा है। पहले कंपनी ही पानी के पंपों, बिजली के बिल और वितरण का जिम्मा उठाती थी। अब कंपनी के बंद होने से यह सिस्टम ठप है। स्थानीय लोगों को पानी के लिए 16 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है और ईंधन पर करीब 360 रुपये (500 केन्याई शिलिंग) खर्च करने पड़ते हैं।

आधी रात तक बाल्टी के लिए कतार महिलाओं और बच्चों की स्थिति सबसे अधिक दयनीय है। लोग एक-दो बाल्टी पानी के लिए रात के 11 बजे तक कतार में खड़े रहने को मजबूर हैं। शहर में अब पानी का एकमात्र सहारा कुछ इमरजेंसी ट्रक हैं, जो जरूरत का एक छोटा सा हिस्सा भी पूरा नहीं कर पा रहे हैं। कई सरकारी स्कूल भी इसी संकट से जूझ रहे हैं।

कॉर्पोरेट इंफ्रास्ट्रक्चर पर निर्भरता का सच इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मगाडी में बुनियादी सुविधाएं स्वतंत्र सरकारी सिस्टम पर आधारित होने के बजाय पूरी तरह कॉर्पोरेट इंफ्रास्ट्रक्चर के भरोसे थीं। स्थानीय लोगों ने केन्या सरकार से अपील की है कि जब तक कंपनी का कामकाज बहाल नहीं होता, तब तक वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर पानी के टैंकरों की संख्या बढ़ाई जाए। यह संकट एक शहर की उस सच्चाई को बयां कर रहा है, जहां एक कंपनी का ताला लगना पूरी आबादी की बुनियादी जरूरतों का ताला बंद होने जैसा है।

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