शिक्षक दिवस पर पीएम मोदी का क्लासरूम : बच्चों के हुनर से लेकर स्क्रीन टाइम तक पर खुलकर हुई चर्चा
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शिक्षक दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेशनल टीचर्स अवॉर्ड पाने वाले शिक्षकों के साथ एक अनौपचारिक और आत्मीय संवाद किया। 7, लोक कल्याण मार्ग पर हुई इस मुलाकात में पीएम मोदी ने न केवल शिक्षकों के अनुभवों को सुना, बल्कि शिक्षा जगत के भविष्य और चुनौतियों पर भी चर्चा की।

जब शिक्षक ने पीएम से ही मांगे टिप्स संवाद के दौरान एक शिक्षिका ने बताया कि वह बच्चों को पब्लिक स्पीकिंग और आत्मविश्वास सिखाती हैं। इस पर पीएम मोदी ने मजाकिया अंदाज में पूछा, अगर मैं आपका छात्र हूं, तो वक्ता बनने के लिए मुझे क्या टिप्स देंगी? शिक्षिका ने कहा, आपको कॉन्फिडेंस में रहना चाहिए। पीएम ने हंसते हुए कहा कि आपका ऑरा देखकर मुझे डाउट हो रहा है। पूरी बातचीत हंसी-मजाक और सीखने-सिखाने के माहौल में डूबी रही।

बच्चों के भीतर छिपी प्रतिभा की पहचान पीएम मोदी ने शिक्षकों से पूछा कि क्या वे हर बच्चे के भीतर छिपी उस विशेष प्रतिभा को पहचानने की कोशिश करते हैं, जो शायद किताबों में अव्वल न हो। इस पर एक शिक्षिका ने कहा कि शिक्षकों की असली कोशिश यही होती है कि वे हर बच्चे के अलग टैलेंट और चुनौतियों को समझें।

ब्रेस्ट कैंसर और सामाजिक जागरूकता एक अन्य शिक्षिका ने बताया कि वह ब्रेस्ट कैंसर के प्रति महिलाओं को जागरूक करने का कार्य कर रही हैं। इस पर पीएम मोदी ने अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि काशी में ब्रेस्ट कैंसर अवेयरनेस अभियान को लेकर महिलाओं की झिझक खत्म हुई है और वहां बड़ी संख्या में महिलाएं स्क्रीनिंग के लिए आगे आ रही हैं, जो एक बड़ी उपलब्धि है।

स्क्रीन टाइम और ड्रग्स की चुनौती प्रधानमंत्री ने आज के दौर में बच्चों की सबसे बड़ी समस्या स्क्रीन टाइम एडिक्शन पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि बच्चों को मैदान में खेलकूद और रचनात्मक कार्यों में जोड़ना ही इस लत का एकमात्र इलाज है। साथ ही, उन्होंने शिक्षकों का आह्वान किया कि वे केवल सिलेबस तक सीमित न रहें, बल्कि बच्चों के व्यवहार में आ रहे बदलावों पर भी नजर रखें, ताकि उन्हें ड्रग्स जैसी बुराइयों से दूर रखा जा सके।

सिलेबस से परे देखने की जरूरत अंत में पीएम मोदी ने जोर दिया कि एक शिक्षक का काम केवल ज्ञान देना ही नहीं, बल्कि बच्चों के बचपन को जीवंत बनाए रखना भी है। उन्होंने कहा कि शिक्षकों को क्लासरूम की चारदीवारी से बाहर निकलकर बच्चों की जिंदगी को करीब से देखना चाहिए, क्योंकि सही मार्गदर्शन ही बच्चों का भविष्य संवार सकता है।

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