पीएम मोदी का उज्बेकिस्तान दौरा: ऊर्जा, खनिज और रणनीतिक साझेदारी पर टिकीं नजरें
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उज्बेकिस्तान और किर्गिस्तान का चार दिवसीय दौरा भारत की मध्य एशियाई कूटनीति के लिए एक नया अध्याय है। ताशकंद पहुंचे पीएम मोदी का उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शौकत मिर्जियोयेव ने गर्मजोशी से स्वागत किया। इस यात्रा के दौरान व्यापार, रक्षा, ऊर्जा और डिजिटल कनेक्टिविटी जैसे क्षेत्रों में सहयोग पर विशेष जोर रहेगा।

प्राकृतिक संसाधनों का पावरहाउस है उज्बेकिस्तान उज्बेकिस्तान अपनी भौगोलिक स्थिति के साथ-साथ अपनी धरती के नीचे दबे अपार प्राकृतिक संसाधनों के लिए जाना जाता है। यहां यूरेनियम, प्राकृतिक गैस, सोना, तांबा और जस्ता जैसे खनिजों का विशाल भंडार है। भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा और औद्योगिक विकास की दृष्टि से ये संसाधन बेहद महत्वपूर्ण हैं।

भारत के लिए क्यों गेम-चेंजर है यूरेनियम? उज्बेकिस्तान दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा यूरेनियम आपूर्तिकर्ता है। वर्ल्ड न्यूक्लियर एसोसिएशन के आंकड़ों के मुताबिक, 2025 तक यहां का उत्पादन 7,000 टन तक पहुंचने का अनुमान है। भारत अपनी परमाणु ऊर्जा क्षमता को बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है, ऐसे में उज्बेकिस्तान से मिलने वाला यूरेनियम और परमाणु ईंधन भारत के लिए भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित कर सकते हैं।

आधुनिक तकनीक का उपयोग उज्बेकिस्तान में यूरेनियम निकालने के लिए इन-सीटू लीचिंग तकनीक का उपयोग किया जाता है। यह पारंपरिक खुदाई की तुलना में कम पर्यावरणीय प्रभाव डालती है और अधिक प्रभावी है। हाल ही में किजिलकॉक खदान से व्यावसायिक स्तर पर उत्पादन शुरू होने से इस क्षेत्र की उत्पादन क्षमता और बढ़ने की उम्मीद है।

ऊर्जा और खनिज: नई संभावनाओं का द्वार उज्बेकिस्तान में प्राकृतिक गैस का दबदबा है, जिसका उपयोग वे पेट्रोकेमिकल उत्पादों के निर्माण में करना चाहते हैं। इसके अलावा, दुनिया भर में इलेक्ट्रिक वाहनों और बैटरी के लिए तांबा, लिथियम और दुर्लभ खनिज (Rare Earth Elements) की जो होड़ मची है, उसमें भी उज्बेकिस्तान एक प्रमुख केंद्र बन सकता है। भारत और उज्बेकिस्तान की साझेदारी इन संसाधनों की आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत कर सकती है।

व्यापार और कनेक्टिविटी की चुनौतियां भारत और उज्बेकिस्तान के बीच द्विपक्षीय व्यापार करीब 1.3 अरब डॉलर का है। इस व्यापारिक रिश्ते को और ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए कनेक्टिविटी सबसे बड़ी चुनौती है। हालांकि, भारत चाबहार बंदरगाह के जरिए मध्य एशिया तक अपनी पहुंच बनाने के प्रयास तेज कर रहा है, जिससे भविष्य में परिवहन लागत और समय में कमी आएगी।

रणनीतिक महत्व और सुरक्षा यह दौरा केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामरिक दृष्टि से भी अहम है। अफगानिस्तान की स्थिति को देखते हुए आतंकवाद और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मसले दोनों देशों के लिए साझा चिंता के केंद्र हैं। रूस, चीन और अमेरिका जैसे बड़े देशों की मौजूदगी के बीच, भारत का उज्बेकिस्तान के साथ गहराता रिश्ता मध्य एशिया में भारत की रणनीतिक पकड़ को और मजबूत करेगा।

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