नेपाल जल-प्रलय: अर्थव्यवस्था का 10% हिस्सा डूबा, क्या 2015 के भूकंप से भी बड़ी है यह चुनौती?
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नेपाल में हाल ही में आई भीषण बाढ़ और भूस्खलन ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है। ग्लेशियर फटने के बाद भोटेकोशी और त्रिशूली नदी प्रणालियों में आए अचानक उफान ने रसुवा, नुवाकोट और धाडिंग जैसे जिलों को मलबे में तब्दील कर दिया है।

मौत का आंकड़ा और रेस्क्यू का संकट

इस आपदा में अब तक 600 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है, जबकि करीब 2,400 लोग अभी भी लापता हैं। लापता लोगों में 178 भारतीय नागरिक भी शामिल हैं। तबाही का आलम यह है कि अस्पतालों के मुर्दाघर कम पड़ गए हैं।

हालात की गंभीरता को देखते हुए नेपाल सरकार ने भारत समेत 4 देशों से रेस्क्यू और शवों की पहचान के लिए मदद मांगी है। मुख्य चुनौती राजधानी काठमांडू से प्रभावित जिलों का संपर्क फिर से बहाल करना है, क्योंकि कई प्रमुख पुल और सड़कें पूरी तरह बह चुकी हैं।

अर्थव्यवस्था को 5 अरब डॉलर की चपत

नेपाल के वित्त मंत्रालय के शुरुआती अनुमानों के मुताबिक, बुनियादी ढांचे के पुनर्निर्माण में 4 से 5 अरब डॉलर का खर्च आ सकता है। यह रकम नेपाल की कुल जीडीपी का लगभग 10 प्रतिशत है।

बाढ़ ने न केवल सड़कों और घरों को तबाह किया है, बल्कि देश की जलविद्युत परियोजनाओं को भी बड़ा झटका दिया है। प्रभावित परियोजनाएं नेपाल की कुल बिजली उत्पादन क्षमता का 12 फीसदी से अधिक हैं, जो देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा आर्थिक जोखिम है।

2015 के भूकंप से तुलना: कितना लंबा होगा संघर्ष?

भले ही 4-5 अरब डॉलर का यह नुकसान 2015 के भूकंप (9 अरब डॉलर) से कम है, लेकिन चुनौती कम नहीं है। 2015 में पुनर्निर्माण कार्य को पूरा होने में लगभग 5 साल का समय लगा था।

विशेषज्ञों का मानना है कि मलबा हटने के बाद जनजीवन कुछ हफ्तों में पटरी पर आता दिख सकता है, लेकिन पूरी तरह से रिकवरी में सालों लग सकते हैं। कुछ संवेदनशील पहाड़ी इलाकों को फिर से व्यवस्थित करने में तो 20 से 25 साल तक का लंबा समय लग सकता है।

आगे की राह: क्या है बड़ी चुनौती?

फिलहाल सरकार का पूरा ध्यान राहत कार्य और जरूरी सेवाओं को बहाल करने पर है। हालांकि, पर्यटन पर निर्भर नेपाल की अर्थव्यवस्था के लिए सड़कों और पुलों का टूटना एक बड़ी बाधा है। रेमिटेंस और जलविद्युत के बाद पर्यटन ही देश की आय का बड़ा जरिया है, जो इस आपदा के कारण लंबे समय तक प्रभावित रह सकता है।

नेपाल के सामने अब चुनौती सिर्फ घरों का पुनर्निर्माण नहीं, बल्कि उस पूरे बुनियादी ढांचे को फिर से खड़ा करना है, जो देश की रीढ़ है।

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