खिलाड़ियों पर फिटनेस का हंटर , मगर कोच और सिलेक्टर्स को क्लीन चिट क्यों?
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भारतीय क्रिकेट में इन दिनों एक अजीब सी बैचेनी है। एक तरफ दुनिया भर में बीसीसीआई का रुतबा है, तो दूसरी तरफ मैदान पर टीम इंडिया के खिलाड़ी फिटनेस के मोर्चे पर बुरी तरह संघर्ष करते दिख रहे हैं। इंग्लैंड और आयरलैंड दौरे पर टीम के लचर प्रदर्शन ने मैनेजमेंट को हिलाकर रख दिया है।

फिटनेस के नए कठोर पैमाने

नतीजा यह है कि बीसीसीआई ने फिटनेस पैरामीटर्स को बेहद चुनौतीपूर्ण बना दिया है। ताजा नियमों के अनुसार, अब ब्रोंको टेस्ट का समय 6 मिनट से घटाकर 5.15 से 5.20 मिनट कर दिया गया है। इसके तुरंत बाद खिलाड़ियों को 9 से 10 मिनट के अंदर 2 किलोमीटर की दौड़ भी पूरी करनी होगी। क्या यह फैसला टीम की नाक बचा पाएगा या खिलाड़ियों के लिए नई मुसीबत बन जाएगा?

क्या खिलाड़ियों की बलि चढ़ाई जा रही है?

एक खेल पत्रकार के तौर पर यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या यह फैसला जल्दबाजी में लिया गया है? इंग्लैंड दौरे पर हर्षित राणा को सिर्फ इसलिए वापस भेज दिया गया क्योंकि उनका वजन 97 किलो था। दूसरी तरफ, ऐसी रिपोर्ट्स भी हैं कि नीतीश कुमार रेड्डी जैसे खिलाड़ियों को बिना पूर्ण फिटनेस के ही सेंटर ऑफ एक्सिलेंस से क्लियरेंस मिल गया था। अगर ऐसा टीम मैनेजमेंट की मांग पर हुआ, तो फिर फिटनेस के नियम किसके लिए हैं?

कोच और सिलेक्टर्स की जवाबदेही कहां है?

सबसे बड़ा सवाल हेड कोच गौतम गंभीर और मुख्य चयनकर्ता की सोच पर है। अगर किसी अधूरी फिटनेस वाले खिलाड़ी को टीम में चुना जाता है और वह मैदान पर फ्लॉप होता है, तो इसका जिम्मेदार कौन है? सिलेक्टर्स और कोच को केवल खिलाड़ियों पर दबाव बनाने के बजाय अपनी चयन नीति पर भी आत्मचिंतन करना चाहिए। अगर हार का कारण आपकी जिद है, तो जवाबदेही भी आपको ही लेनी होगी।

सीनियर खिलाड़ियों पर क्या लागू होंगे नियम?

बीसीसीआई ने फिजियो कमलेश जैन को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि स्टार स्टेटस की परवाह किए बिना फिटनेस रिपोर्ट दी जाए। लेकिन क्या रोहित शर्मा, विराट कोहली और रवींद्र जडेजा जैसे दिग्गजों पर ये सख्त पैमाने उसी तरह लागू होंगे? हालांकि विराट कोहली फिटनेस की मिसाल हैं, लेकिन बुमराह जैसे मैच विनर का फिट न हो पाना सिस्टम की खामियों को उजागर करता है।

कहीं बर्नआउट तो नहीं बन जाएगा नई मुसीबत?

साल 2026 में चोटिल खिलाड़ियों की लिस्ट डराने वाली है। ऋषभ पंत, सुंदर, तिलक वर्मा और बुमराह का बार-बार चोटिल होना बताता है कि वर्कलोड मैनेजमेंट में कहीं चूक हो रही है। यदि हर सिलेक्शन से पहले खिलाड़ियों को ब्रोंको और यो-यो टेस्ट की मशीन से गुजारा गया, तो मानसिक और शारीरिक थकान से चोट का खतरा और बढ़ सकता है।

चैंपियन बनने के लिए सोच बदलना जरूरी

आने वाले दो साल टीम इंडिया के लिए अग्निपरीक्षा जैसे हैं। न्यूज़ीलैंड दौरा, बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी और आईसीसी इवेंट्स जैसे बड़े टूर्नामेंट सामने हैं। बीसीसीआई को यह समझना होगा कि खिलाड़ियों को मशीन समझकर ओवर-ट्रेन करने से जीत नहीं मिलेगी। केवल फिटनेस के नियम कड़े करने से काम नहीं चलेगा, बदलाव की शुरुआत ड्रेसिंग रूम के लीडर्स और मैनेजमेंट की सोच से होनी चाहिए। फिटनेस जरूरी है, लेकिन खिलाड़ियों की सही संभाल उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है।

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