भारत को मनहूस बताने वाली निवेदिता मेनन का सच: जेएनयू की पूर्व प्रोफेसर के विवादित बयानों का कच्चा-चिट्ठा
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हाल ही में पत्रकार मंदीप पुनिया को दिए एक इंटरव्यू में जेएनयू (JNU) की पूर्व प्रोफेसर निवेदिता मेनन ने भारत राष्ट्र और उसकी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर तीखे हमले किए हैं। इस साक्षात्कार में उन्होंने न केवल भारत को मनहूस देश कहा, बल्कि देश की संप्रभुता और संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ जहर उगलने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

भारत को मनहूस बताने की कुत्सित सोच

इंटरव्यू के दौरान निवेदिता मेनन ने भारत को एक मनहूस देश करार दिया। उन्होंने तर्क दिया कि पिछले 12 वर्षों में मुसलमानों को लगातार हाशिए पर धकेला गया है। उन्होंने सीजेपी (CJP) जैसे प्रदर्शनों का महिमामंडन करते हुए कहा कि इन्हीं आंदोलनों की वजह से मुसलमानों को इस मनहूस देश में जगह मिलने का एहसास हुआ है। एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में पढ़ाने वाली प्रोफेसर द्वारा देश के लिए ऐसे शब्दों का इस्तेमाल उनकी भारत विरोधी मानसिकता को उजागर करता है।

संस्थाओं और सरकार पर जहरीले प्रहार

मेनन ने केंद्र सरकार, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और नई शिक्षा नीति (NEP) पर भी अभद्र टिप्पणियाँ कीं। उन्होंने नए शिक्षा मंत्री और सरकार द्वारा गठित हाई पावर टास्क फोर्स का मजाक उड़ाया। इतना ही नहीं, उन्होंने देश में चल रही लोकतांत्रिक प्रक्रिया, ईवीएम (EVM) और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर भी गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि देश में पिछले 12 वर्षों से हिंदू राष्ट्र की छाया है।

गालियों को बताया बैज ऑफ ऑनर

प्रोफेसर मेनन ने प्रधानमंत्री और संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के खिलाफ इस्तेमाल की जा रही अमर्यादित भाषा का भी बचाव किया। उन्होंने इसे क्रांतिकारी प्रतिरोध और एंटी-पेट्रियारकल बताते हुए इन्हें फूलों का गुलदस्ता और बैज ऑफ ऑनर (सम्मान का पदक) की संज्ञा दी। एक शिक्षाविद द्वारा युवाओं को अपशब्दों के प्रयोग के लिए प्रेरित करना उनके नैतिक पतन का प्रमाण है।

लव जिहाद और कश्मीर पर पहले भी दे चुकी हैं विवादित बयान

यह पहली बार नहीं है जब निवेदिता मेनन अपने बयानों से विवादों में घिरी हैं। उनका अतीत भारत विरोधी गतिविधियों और बयानों से भरा पड़ा है:

वैचारिक आतंकवाद का खतरा

निवेदिता मेनन का पूरा एजेंडा किसी राजनीतिक दल का विरोध करना नहीं, बल्कि भारत की अखंडता और सामाजिक ताने-बाने को कमजोर करना प्रतीत होता है। जेएनयू जैसे संस्थानों का उपयोग युवाओं के मन में देश, न्यायपालिका और सेना के प्रति नफरत भरने के लिए किया जा रहा है।

लोकतंत्र में असहमति का स्थान है, लेकिन जब असहमति की आड़ में राष्ट्र के अस्तित्व को नकारा जाए और अराजकता को क्रांति बताया जाए, तो उसे अभिव्यक्ति की आजादी नहीं बल्कि वैचारिक आतंकवाद माना जाना चाहिए। समय आ गया है कि इस तरह के एजेंडाधारियों के सुनियोजित दुष्प्रचार को तार्किक रूप से पहचाना जाए।

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