91 साल में पहली बार: तेजस्विन शंकर का डेकाथलन कांस्य किसी स्वर्ण से कम क्यों नहीं?
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ग्लासगो में चल रहे 23वें कॉमनवेल्थ गेम्स का 9वां दिन भारतीय खेलों के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गया है। जहां एक ओर जूडो में भारत को नए सितारे मिले, वहीं एथलेटिक्स ट्रैक पर तेजस्विन शंकर ने वह करिश्मा कर दिखाया जो पिछले 91 वर्षों में कोई भारतीय नहीं कर सका था।

डेकाथलन में रचा इतिहास

कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत 1934 से हिस्सा ले रहा है, लेकिन आज तक डेकाथलन में हमारा खाता नहीं खुला था। तेजस्विन शंकर ने इस सूखे को खत्म करते हुए कांस्य पदक अपने नाम किया। यह उपलब्धि न केवल ऐतिहासिक है, बल्कि भारतीय एथलीटों के लिए एक नया स्वर्णिम अध्याय भी है।

क्यों वेरी-वेरी स्पेशल है यह पदक?

डेकाथलन को खेलों की सबसे कठिन परीक्षा माना जाता है। इसमें किसी एथलीट को दो दिनों के भीतर कुल 10 अलग-अलग स्पर्धाओं से गुजरना पड़ता है। यह केवल शारीरिक मजबूती ही नहीं, बल्कि मानसिक दृढ़ता का भी असली टेस्ट है।

दो दिन का कड़ा संघर्ष और 10 चुनौतियां

तेजस्विन ने 30 और 31 जुलाई को अपनी सहनशक्ति का परिचय दिया। पहले दिन उन्होंने 100 मीटर दौड़, लंबी कूद, शॉट पुट, हाई जंप और 400 मीटर दौड़ में भाग लिया। दूसरे दिन उन्होंने 110 मीटर बाधा दौड़, डिस्कस थ्रो, पोल वॉल्ट, जेवलिन थ्रो और अंत में 1500 मीटर दौड़ पूरी की।

दर्द में भी नहीं डिगा हौसला

सबसे बड़ी बात यह रही कि तेजस्विन ने घुटने के दर्द के बावजूद अपनी अंतिम बाधा यानी 1500 मीटर की रेस पूरी की। उन्होंने कुल 7,976 अंकों के साथ कांस्य पदक पर कब्जा जमाया। इस स्पर्धा में ग्रेनाडा के लिंडन विक्टर ने स्वर्ण और कनाडा के डेमियन वॉर्नर ने रजत पदक जीता।

तेजस्विन का यह पदक साबित करता है कि भारतीय खिलाड़ी अब दुनिया की सबसे चुनौतीपूर्ण स्पर्धाओं में भी अपना लोहा मनवाने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।

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