अगले सप्ताह संसद में विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक (FCRA Amendment Bill) पेश किया जा सकता है। इस प्रस्तावित बिल की चर्चा शुरू होते ही देश भर के NGO, ट्रस्ट और शैक्षणिक संस्थानों में हलचल मच गई है। सरकार का कहना है कि यह बदलाव विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता लाने के लिए जरूरी है, जबकि कुछ राजनीतिक दल और सामाजिक संगठन इसे संस्थानों की स्वायत्तता पर हमला बता रहे हैं।
FCRA का पूरा नाम Foreign Contribution (Regulation) Act यानी विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम है। यह कानून यह तय करता है कि भारत में कौन व्यक्ति या संस्था विदेश से आर्थिक मदद ले सकती है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी धन का इस्तेमाल भारत के राष्ट्रीय हितों या राजनीति को प्रभावित करने के लिए न हो। यह कानून 1976 में पहली बार आया और 2010 में इसे अपडेट किया गया। इसके बाद 2020 में इसमें बड़े बदलाव किए गए थे।
अक्सर लोग एक्ट और बिल को एक ही समझ लेते हैं। आसान भाषा में कहें तो FCRA एक्ट वह मौजूदा कानून है जो अभी लागू है। वहीं, FCRA बिल वह प्रस्ताव है जिसे सरकार संसद में बदलाव करने के लिए पेश करती है। जब यह बिल लोकसभा और राज्यसभा से पास होकर राष्ट्रपति के पास जाता है और उनकी मंजूरी मिल जाती है, तब यह संशोधित कानून का रूप ले लेता है।
FCRA का दायरा काफी विस्तृत है। यह मुख्य रूप से उन सभी संस्थाओं पर लागू होता है जो विदेश से दान या सहायता प्राप्त करती हैं। इनमें शामिल हैं:
हाल ही में विपक्ष के कुछ नेताओं ने इस प्रस्तावित बिल को लेकर चिंता जताई है। आरोप है कि नए संशोधनों के जरिए सरकार शिक्षण संस्थानों, अस्पतालों और धार्मिक स्थलों (जैसे मंदिर, मस्जिद, चर्च) की संपत्तियों पर अपना नियंत्रण बढ़ा सकती है। इसके विपरीत, सरकार का तर्क है कि कई बार विदेशी धन का दुरुपयोग निजी लाभ या राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों में किया जाता है, जिसे रोकने के लिए सख्त नियमों की सख्त आवश्यकता है।
सोनम वांगचुक जैसे कई चर्चित नामों के NGO पर पहले भी इस कानून के तहत कार्रवाई हो चुकी है, जिसके बाद से ही समय-समय पर इस कानून की सख्ती को लेकर बहस छिड़ती रही है। अब सबकी निगाहें अगले सप्ताह संसद में पेश होने वाले उस ड्राफ्ट पर टिकी हैं, जो स्पष्ट करेगा कि नए नियम कितने सख्त होंगे।
After the introduction of the FCRA Amendment Bill 2026 in Loksabha, which is likely to usurp the properties of majority and minority institutions such as schools, colleges, hospitals, medical institutions, and places of worship like temples, mosques, and churches, and scheduled… pic.twitter.com/vrEmDEO7m8
— P. Wilson (@PWilsonDMK) July 31, 2026
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