पिता की बीमारी का दर्द और एक कागज का टुकड़ा: सारांश जैन के टीम इंडिया तक पहुंचने की दिल छू लेने वाली गाथा
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भारतीय टेस्ट टीम में पहली बार शामिल हुए मध्य प्रदेश के ऑलराउंडर सारांश जैन का सफर केवल रनों और विकेटों का लेखा-जोखा नहीं है। यह कहानी है उस संकल्प की, जो एक कैंसर पीड़ित पिता की आंखों में पल रहे सपने को हकीकत में बदलने के लिए बुना गया था।

कागज पर लिखे उस संदेश ने बदल दी दिशा साल 2014 में जब 21 वर्षीय सारांश ऑस्ट्रेलिया दौरे पर थे, तब घर पर उनके पिता सुबोध जैन मुंह के कैंसर से जूझ रहे थे। परिवार ने सारांश को यह बात नहीं बताई थी ताकि उनका खेल प्रभावित न हो। घर लौटने पर जब उन्होंने पिता की हालत देखी, तो सुबोध जैन बोल पाने की स्थिति में नहीं थे। उन्होंने एक कागज पर लिखा: बेटा, तू जितना अच्छा करेगा, मैं उतनी जल्दी ठीक हो जाऊंगा। इसी संदेश ने सारांश को मैदान पर अडिग रहने का हौसला दिया।

हनुमान मंदिर में मिली खुशखबरी मंगलवार को जब भारतीय टीम का ऐलान हुआ, सारांश इंदौर के एक हनुमान मंदिर में अपनी नियमित पूजा कर रहे थे। मंदिर से बाहर निकलते ही उन्हें अपने चयन का पता चला। उनके पिता सुबोध जैन ने भावुक होकर कहा, मैंने खुद मध्य प्रदेश के लिए रणजी खेला, लेकिन भारत के लिए खेलने का सपना अधूरा रह गया था, जिसे आज बेटे ने पूरा कर दिया।

पिता ही बने पहले कोच सुबोध जैन खुद भी एक पूर्व ऑफ स्पिनर रहे हैं और उन्होंने ही सारांश को क्रिकेट के शुरुआती गुर सिखाए थे। सुबोध बताते हैं कि जब सारांश महज 11 साल का था, तभी रजत पाटीदार के साथ खेलते हुए उसने अपनी प्रतिभा की छाप छोड़ दी थी। बाद के दिनों में सारांश ने रविचंद्रन अश्विन के वीडियो देखकर अपनी गेंदबाजी की तकनीक को और भी धारदार बनाया।

संघर्ष और निरंतरता का इनाम सारांश का सफर आसान नहीं था। रणजी डेब्यू में तमिलनाडु के खिलाफ पांच विकेट लेने के बाद भी उन्हें उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ा। पूर्व कोच चंद्रकांत पंडित ने उनके टैलेंट पर भरोसा जताया। इसके बाद सारांश ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। दलीप ट्रॉफी में 16 विकेट और ईरानी कप में शानदार प्रदर्शन के दम पर उन्होंने चयनकर्ताओं का ध्यान अपनी ओर खींचा।

पिता की अंतिम सलाह: दबाव मत लेना टीम इंडिया में जगह बनाने के बाद पिता सुबोध जैन ने बेटे को सिर्फ एक गुरुमंत्र दिया है— बिंदास खेलना, किसी भी तरह का दबाव मत लेना। अब सारांश के सामने न केवल भारतीय जर्सी को गौरवान्वित करने की चुनौती है, बल्कि उस भरोसे को भी कायम रखने की जिम्मेदारी है, जिसने उन्हें जीवन के सबसे कठिन दौर में कभी टूटने नहीं दिया।

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