मजदूरी से मेडल तक: ऋषिकांत सिंह की संघर्ष गाथा, जिसने कभी ईंटें ढोकर गुजारा किया था
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कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत को गौरवान्वित करने वाले वेटलिफ्टर ऋषिकांत सिंह की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। पुरुषों के 60 किग्रा भारोत्तोलन वर्ग में रजत पदक जीतकर इतिहास रचने वाले ऋषिकांत ने एक वक्त ऐसा भी देखा था जब उनके हाथों में लोहे की रॉड नहीं, बल्कि ईंटें और कंस्ट्रक्शन का सामान होता था।

ग्लासगो में भारत का मान कॉमनवेल्थ गेम्स में अपने डेब्यू पर ही ऋषिकांत ने कुल 264 किग्रा (121+143) वजन उठाकर सिल्वर मेडल अपने नाम किया। स्वर्ण पदक के बेहद करीब पहुंचे ऋषिकांत ने आखिरी प्रयास में 151 किग्रा उठाकर गोल्ड की कोशिश की, लेकिन वे सफल नहीं हो सके। इस मुकाबले में मलेशिया के अनिक कासदान ने 273 किग्रा के गेम्स रिकॉर्ड के साथ स्वर्ण पदक जीता।

मजदूरी करने को थे मजबूर एक समय ऋषिकांत की जिंदगी केवल संघर्ष के इर्द-गिर्द सिमट गई थी। आर्थिक तंगी के कारण उन्हें अपने सपनों को तिलांजलि देनी पड़ी थी। मणिपुर के इंफाल में वे कंस्ट्रक्शन साइटों पर मजदूरी करते थे और ढाबों पर हेल्पर के तौर पर काम करते थे। उस दौर को याद करते हुए उन्होंने कहा था, मैंने वेटलिफ्टिंग जगत से पूरी तरह संपर्क तोड़ लिया था। मुझे लगा मेरा खेल का करियर खत्म हो गया है।

अभाव में बीता बचपन ऋषिकांत की प्रतिभा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे 2017 में ही नेशनल यूथ चैंपियन बने थे और यूथ कॉमनवेल्थ गेम्स में ब्रॉन्ज मेडल भी जीता था। हालांकि, उस उम्र में पदक तो मिले, लेकिन न तो भविष्य की सुरक्षा मिली और न ही पर्याप्त आर्थिक मदद। इसी हताशा ने उन्हें एक साल तक खेल से दूर कर दिया था।

शानदार वापसी और नेशनल रिकॉर्ड हार न मानने की जिद ने उन्हें दोबारा वेटलिफ्टिंग की तरफ खींचा। इंडियन आर्मी के स्पोर्ट्स सेटअप की मदद से उन्होंने फिर वापसी की। 2025 की कॉमनवेल्थ वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप में उन्होंने गोल्ड जीता और नेशनल रिकॉर्ड बनाया। इसके बाद 2024 नेशनल चैंपियनशिप में 61 किग्रा कैटेगरी में 124 किग्रा का नेशनल स्नैच रिकॉर्ड बनाकर उन्होंने साबित कर दिया कि वे रुकने वाले नहीं हैं।

सपनों की उड़ान जारी मणिपुर के इस एथलीट का सफर उन हजारों युवाओं के लिए मिसाल है जो अभावों से जूझ रहे हैं। मजदूरी का बोझ उठाने से लेकर कॉमनवेल्थ पोडियम पर भारत का तिरंगा लहराने तक का ऋषिकांत सिंह का यह सफर उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति और मेहनत का प्रमाण है।

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