धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा: जंतर-मंतर पर थमा 37 दिनों का इंकलाब , अभिजीत दिपके ने ली राहत की सांस
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नीट (NEET) पेपर लीक विवाद के बाद देश की राजनीति में बड़ा बदलाव आया है। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और सरकार द्वारा प्रदर्शनकारियों की सभी मांगें मान लिए जाने के बाद, जंतर-मंतर पर पिछले 37 दिनों से चल रहा छात्रों का धरना आधिकारिक रूप से समाप्त हो गया है।

आंदोलन के बाद सुकून का अहसास कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दिपके ने इस जीत के बाद राहत की सांस ली है। सोशल मीडिया पर जारी एक वीडियो संदेश में उन्होंने कहा, अब मैं बिना इस फिक्र के सो सकता हूं कि आगे क्या करना है। यह 37 दिनों का दौर बेहद कठिन और संघर्षपूर्ण था।

व्यंग्य से शुरू हुआ जेन-जी का बड़ा मंच मई में मुख्य न्यायाधीश की एक टिप्पणी पर तंज कसते हुए शुरू की गई कॉकरोच जनता पार्टी देखते ही देखते युवाओं का एक शक्तिशाली मंच बन गई। पिछले 70 दिनों में इस आंदोलन ने देश के जेन-जी (Gen-Z) को एकजुट कर दिया, जो शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग के साथ सड़कों पर उतर आए थे।

जंतर-मंतर पर गूंजा इंकलाब NEET पेपर लीक और छात्रों की आत्महत्याओं के कारण देश भर के युवा आक्रोशित थे। दिल्ली के जंतर-मंतर पर हज़ारों छात्रों ने मोर्चा संभाल लिया था। जैसे-जैसे सरकार की ओर से देरी हुई, यह आंदोलन और अधिक उग्र होता गया। अंततः सरकार को झुकना पड़ा और धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। साथ ही, सरकार ने प्रदर्शनकारियों पर दर्ज किए गए सभी मुकदमे वापस लेने का भी आश्वासन दिया है।

बीमारी से जंग और जीत का जज्बा दिपके ने बताया कि आंदोलन के अंतिम दिनों में वे टाइफाइड और तेज बुखार से जूझ रहे थे, जिसके कारण वे जंतर-मंतर पर व्यक्तिगत रूप से सभी का आभार नहीं जता सके। उन्होंने उन सभी युवाओं का धन्यवाद किया जो कड़ाके की धूप और स्वास्थ्य समस्याओं के बावजूद 37 दिनों तक डटे रहे।

आलोचनाओं से मिली सीख अभिजीत दिपके ने अपने आलोचकों का भी शुक्रिया अदा किया। उन्होंने कहा कि विपक्ष और ट्रोलर्स द्वारा की गई आलोचनाओं ने उन्हें अपनी रणनीति में सुधार करने और इस आंदोलन को एक तार्किक अंजाम तक पहुंचाने में मदद की है।

कैलाश विजयवर्गीय ने भी इस मामले पर बड़ा दावा करते हुए कहा कि धर्मेंद्र प्रधान तो पहले ही दिन इस्तीफा देने के लिए तैयार थे। सरकार के रुख और युवाओं के दबाव के बाद, फिलहाल जंतर-मंतर अब शांत है, लेकिन यह आंदोलन देश की शिक्षण प्रणाली के इतिहास में एक मील का पत्थर बन गया है।

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