न प्लास्टिक, न भीड़... 1939 में ऐसा दिखता था मुंबई का जुहू बीच, पुरानी तस्वीरें देख लोग हुए भावुक
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मुंबई की पहचान जुहू बीच की एक पुरानी तस्वीर इन दिनों सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी हुई है। साल 1939 की इस ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर को रिस्टोर किया गया है, जिसे देखकर आज की पीढ़ी हैरान है। तस्वीर में जुहू का वह रूप नजर आता है, जिसकी कल्पना करना भी आज मुश्किल है।

अकल्पनीय शांति और साफ-सफाई तस्वीर में दूर-दूर तक फैली साफ रेत और किनारे से टकराती शांत लहरें दिखाई देती हैं। आज जिस बीच पर पैर रखने की जगह ढूंढना मुश्किल होता है, उस समय वहां गिने-चुने लोग ही नजर आते थे। कहीं कोई प्लास्टिक कचरा या शोर-शराबा नहीं था। यह इलाका पूरी तरह प्राकृतिक खूबसूरती से ओतप्रोत था।

50 साल पुराने वीडियो ने जगाई यादें तस्वीर के साथ ही 50 साल पुराना एक वीडियो भी वायरल हो रहा है। इसमें जुहू बीच किसी विदेशी तट जैसा शांत और स्वच्छ दिख रहा है। वीडियो को देख सोशल मीडिया यूजर्स भावुक हो रहे हैं। लोग कह रहे हैं कि काश मुंबई का यह प्रतिष्ठित तट आज भी वैसा ही होता, जैसा वह करीब आधी सदी पहले था।

बदलाव के लिए कौन जिम्मेदार? जुहू के इस कायापलट के पीछे बढ़ती आबादी, अनियंत्रित शहरीकरण और पर्यटन को मुख्य कारण माना जा रहा है। सबसे बड़ा विलेन सिंगल यूज प्लास्टिक बनकर उभरा है। समुद्र के रास्ते आने वाला कचरा और प्लास्टिक की बोतलें अब इस बीच की स्थायी पहचान बन गई हैं, जिससे इसकी प्राकृतिक सुंदरता खत्म हो रही है।

सोशल मीडिया पर छलका लोगों का दर्द वायरल तस्वीरों पर प्रतिक्रिया देते हुए एक यूजर ने लिखा, असली बदलाव तब आया जब प्लास्टिक हमारी जीवनशैली बन गया। कई लोगों ने चिंता व्यक्त की है कि यदि हमने पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया, तो आने वाले समय में गोवा जैसे अन्य खूबसूरत बीच भी इसी बदहाली का शिकार हो जाएंगे।

प्रदूषण और भविष्य की चुनौतियां कुछ महीने पहले भी समुद्र की लहरों के साथ बड़ी मात्रा में कचरा और औद्योगिक अपशिष्ट बाहर आने का वीडियो सामने आया था। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि यह एक चेतावनी है। यदि समुद्र में कचरा गिराना बंद नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियां जुहू बीच की खूबसूरती को सिर्फ डिजिटल स्क्रीन पर ही देख पाएंगी।

धरोहर बचाने का समय जुहू बीच केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि मुंबई की सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत है। ये पुरानी तस्वीरें हमें आईना दिखा रही हैं कि आधुनिकता की दौड़ में हमने अपनी प्रकृति को कितना नुकसान पहुंचाया है। क्या इसे फिर से संवारना संभव है? यह सवाल आज हर मुंबईकर और जिम्मेदार नागरिक के मन में है।

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