नीट विवाद: धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा क्यों नहीं ले रही मोदी सरकार? जानिए इसके पीछे की असली वजह
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नीट (NEET) परीक्षा में कथित पेपर लीक और धांधली के आरोपों के बाद देशभर में विरोध प्रदर्शन हुए। विपक्षी दलों और विभिन्न संगठनों ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर संसद मार्च और भूख हड़ताल जैसे बड़े आंदोलन किए। इसके बावजूद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रधान को पद पर बरकरार रखा है। आखिर सरकार इस दबाव के आगे क्यों नहीं झुक रही?

दबाव में न झुकने का संदेश राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मोदी सरकार किसी भी आंदोलन के दबाव में आकर निर्णय लेने की छवि नहीं बनाना चाहती। सरकार को डर है कि यदि अभी इस्तीफे के लिए सहमति दी गई, तो भविष्य में हर मुद्दे पर विपक्ष इसी तरह की रणनीति अपनाएगा। सरकार पहले स्थिति का गहन आकलन करने की नीति पर काम कर रही है।

यूपीए सरकार के अनुभवों से सीख यूपीए सरकार के कार्यकाल में अक्सर विवादों के बाद मंत्रियों के इस्तीफे लिए जाते थे। उस दौर में बीजेपी ने इसे कमजोर सरकार की निशानी बताया था। मौजूदा सरकार उस इतिहास को दोहराने के मूड में नहीं है। सरकार का मानना है कि जल्दबाजी में लिया गया फैसला राजनीतिक कमजोरी दर्शाता है।

धर्मेंद्र प्रधान: संगठन में मजबूत कद धर्मेंद्र प्रधान केवल एक मंत्री नहीं, बल्कि भाजपा के एक वरिष्ठ रणनीतिकार भी हैं। ओडिशा विधानसभा चुनाव में भाजपा की ऐतिहासिक जीत और राज्य में संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने में उनकी भूमिका अहम रही है। संघ (RSS) और पार्टी संगठन से उनका गहरा जुड़ाव उन्हें भाजपा के भीतर एक अपरिहार्य नेता बनाता है।

प्रशासनिक विफलता बनाम सुधार सरकार के लिए इस्तीफे का मतलब अपनी ही प्रशासनिक विफलता को स्वीकार करना होता। इसके बजाय, सरकार ने इस पूरे मामले को सुधार की दिशा में मोड़ा है। सीबीआई जांच के निर्देश और एनटीए (NTA) में बड़े प्रशासनिक बदलावों के जरिए सरकार यह संदेश देना चाहती है कि उसका ध्यान समस्या को जड़ से खत्म करने पर है, न कि केवल चेहरे बदलने पर।

भविष्य की रणनीति क्या है? फिलहाल सरकार धर्मेंद्र प्रधान को हटाने के पक्ष में नहीं है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि भविष्य में उनके मंत्रालय में बदलाव या उन्हें संगठन में कोई बड़ी भूमिका दी जा सकती है। फिलहाल, मोदी सरकार का मुख्य फोकस जांच को तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाना और एनटीए की साख बहाल करना है। स्पष्ट है कि भाजपा अपने नेताओं का बचाव तब तक करती है जब तक कि तथ्यों के आधार पर कोई ठोस गलती साबित न हो जाए।

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