एक देश, 4 बड़े मोर्चे: दिल्ली से ऋषिकेश तक सरकार के खिलाफ क्यों सड़कों पर है जनता?
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देश के अलग-अलग हिस्सों में इन दिनों विरोध प्रदर्शनों की लहर सी देखी जा रही है। दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर ऋषिकेश की सड़कों और मध्य प्रदेश के आदिवासी इलाकों तक, जनता अपनी मांगों को लेकर सरकार के सामने डट गई है। आखिर ये विद्रोह क्यों भड़के हैं और इनके पीछे के मुख्य कारण क्या हैं? आइए समझते हैं।

दिल्ली: कॉकरोच जनता पार्टी और नीट विवाद

राजधानी में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का आंदोलन जोर पकड़ चुका है। 3 मई को हुई नीट परीक्षा में पेपर लीक के आरोपों के बाद छात्रों और अभिभावकों का गुस्सा फूटा। CJP ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर संसद तक मार्च निकाला। स्थिति इतनी तनावपूर्ण हुई कि पुलिस को आंसू गैस का इस्तेमाल करना पड़ा और संस्थापक अभिजीत दीपके को हिरासत में लिया गया।

इस आंदोलन को तब बड़ी धार मिली जब सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने इसके समर्थन में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की। 20 दिनों की लंबी हड़ताल के बाद सरकार को हरकत में आना पड़ा और केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा को प्रदर्शनकारियों से बातचीत के लिए भेजा गया।

उत्तर भारत: देश बचाओ मोर्चा की हुंकार

पंजाब, हरियाणा और हिमाचल समेत कई राज्यों के किसान देश बचाओ मोर्चा के बैनर तले एकजुट हो गए हैं। इनका विरोध भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते को लेकर है। किसानों को डर है कि यह समझौता उनकी कृषि, डेयरी और छोटे उद्योगों की कमर तोड़ देगा। सरवन सिंह पंढेर के नेतृत्व में किसान मांग कर रहे हैं कि बिना किसानों के हितों को सुरक्षित किए कोई भी समझौता न किया जाए। 21 जुलाई को दिल्ली में एक महा-रैली की चेतावनी देकर उन्होंने सरकार पर दबाव बढ़ा दिया है।

ऋषिकेश: विकास बनाम पर्यावरण

उत्तराखंड के ऋषिकेश में एनएच-07 के चौड़ीकरण के नाम पर 4,000 पेड़ काटे जाने की योजना के खिलाफ स्थानीय लोग सड़क पर उतर आए हैं। विरोध इतना तीव्र हुआ कि पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव की स्थिति बन गई। हालांकि, राज्य में आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने फिलहाल पेड़ों की कटाई पर रोक लगा दी है, ताकि जनता के बीच कोई नकारात्मक संदेश न जाए।

मध्य प्रदेश: केन-बेतवा परियोजना और आदिवासियों का दर्द

छतरपुर जिले में केन-बेतवा नदी परियोजना के खिलाफ आदिवासी समुदाय का विरोध जारी है। आदिवासियों का आरोप है कि उन्हें विस्थापन के बदले उचित मुआवजा नहीं मिल रहा और उनकी जमीनें छीनी जा रही हैं। 5 जुलाई से शुरू हुआ आमरण अनशन तब चर्चा में आया जब पुलिस ने बाराना नदी के किनारे धरने पर बैठे लोगों को वहां से हटा दिया। पुलिस का तर्क है कि भारी बारिश के कारण वहां रहना असुरक्षित था, जबकि प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यह उनकी आवाज दबाने की कोशिश है।

निष्कर्ष: देश के इन विभिन्न विरोध प्रदर्शनों का स्वरूप अलग है, लेकिन इनमें एक बात समान है—नीतिगत निर्णयों पर असंतोष। जहां सरकार कहीं बातचीत से समाधान निकालने की कोशिश कर रही है, तो कहीं जनभावनाओं का सम्मान करते हुए परियोजनाओं को रोक रही है। यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इन अलग-अलग मोर्चों पर उठे विरोध को कैसे थामती है।

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