मानसून सत्र: संसद चले की अपील या विपक्ष पर दबाव? रिजिजू के बयान से खुली सरकार की नई रणनीति
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संसद के मानसून सत्र के आगाज़ से ठीक पहले सरकार ने अपनी राजनीतिक चालें चल दी हैं। सर्वदलीय बैठक में संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू का यह बयान कि देश चाहता है कि संसद चले और लोकसभा सबकी है, महज एक सामान्य अपील नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है।

सरकार की सद्भावना के पीछे की सियासत सरकार इस बार पिछले सत्रों के हंगामे से सबक लेते हुए जनता के बीच यह संदेश स्थापित करना चाहती है कि सदन में व्यवधान के लिए यदि कोई जिम्मेदार है, तो वह विपक्ष है। रिजिजू ने स्पष्ट किया है कि विपक्ष को अपनी बात कहने का पूरा अधिकार है, लेकिन संसद की गरिमा और कार्यवाही को बाधित करना जनहित में नहीं है। सरकार इस रुख के जरिए नैतिक दबाव बनाने की कोशिश कर रही है।

विपक्ष की घेराबंदी और मुद्दों का अंबार मानसून सत्र में विपक्ष किसी भी सूरत में पीछे हटने के मूड में नहीं है। महंगाई, बेरोजगारी, कृषि संकट, चुनावी सुधार और संघीय ढांचे जैसे ज्वलंत मुद्दों पर विपक्ष सरकार को कटघरे में खड़ा करने की तैयारी कर चुका है। सरकार का संवाद का रुख दरअसल विधायी एजेंडे को सुचारू रूप से आगे बढ़ाने की एक कोशिश है, ताकि हंगामे की भेंट बिल न चढ़ें।

NCPI और परिसीमन: विवादों से दूरी का दांव 20 NCPI सांसदों की मान्यता और सदन में बैठने के स्थान जैसे विवादित मुद्दे पर रिजिजू ने गेंद पूरी तरह लोकसभा अध्यक्ष के पाले में डाल दी है। इसी तरह, परिसीमन (Delimitation) जैसे संवेदनशील विषय पर भी सरकार ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल एजेंडे पर केवल सूचीबद्ध बिल ही रहेंगे। यह सरकार की वेट एंड वॉच नीति को दर्शाता है, ताकि सत्र की शुरुआत किसी बड़े विवाद के साथ न हो।

सत्र या 2029 का लिटमस टेस्ट ? सरकार की रणनीति तीन स्तंभों पर टिकी है—विपक्ष पर नैतिक दबाव, विधायी कार्यों में गति और संवेदनशील मुद्दों पर सतर्क रुख। हालाँकि, मानसून सत्र केवल कानून बनाने का स्थान नहीं रहेगा। यह सत्र आने वाले वर्षों की राजनीति की दिशा भी तय करेगा।

अब सवाल यह है कि क्या विपक्ष सरकार की इस संवाद की अपील को स्वीकार करेगा, या सदन की कार्यवाही पहले दिन से ही कड़े टकराव की भेंट चढ़ जाएगी? आने वाला समय ही बताएगा कि संसद का यह मानसून शांति से बीतेगा या राजनीतिक शोर में खो जाएगा।

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