यूरिया उत्पादन में आत्मनिर्भरता का संकल्प: कैबिनेट का बड़ा फैसला और नई पॉलिसी के 3 बड़े बदलाव
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में किसानों और कृषि अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया है। सरकार ने नेशनल इन्वेस्टमेंट पॉलिसी फॉर यूरिया-2026 (NIPU-2026) को मंजूरी दे दी है। इस नीति का मुख्य उद्देश्य देश में गैस-आधारित यूरिया उत्पादन संयंत्रों को बढ़ावा देकर आयात पर निर्भरता को कम करना है।

बढ़ती मांग और उत्पादन की चुनौती केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बैठक के बाद जानकारी दी कि भारत में यूरिया की मांग हर साल करीब 5 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। पिछले एक दशक में 12.7 लाख मीट्रिक टन क्षमता वाले छह नए संयंत्र शुरू किए गए हैं, लेकिन मांग और आपूर्ति के अंतर को पाटने के लिए उत्पादन क्षमता का और विस्तार करना अनिवार्य हो गया है।

नई यूरिया नीति के 3 प्रमुख बदलाव सरकार ने निवेशकों को आकर्षित करने और उत्पादन प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए नई नीति में तीन बड़े बदलाव किए हैं:

  1. लागत का स्पष्ट वर्गीकरण: अब सब्सिडी की गणना के लिए फिक्स्ड कॉस्ट और वैरिएबल कॉस्ट को अलग-अलग किया जाएगा। इससे उर्वरक परियोजनाओं की लागत का आकलन अधिक पारदर्शी होगा और निवेशकों को एक स्पष्ट पॉलिसी स्ट्रक्चर मिलेगा।
  2. रिटर्न ऑन इक्विटी (ROE) में बढ़ोतरी: नई नीति में इक्विटी पर प्रतिफल (ROE) की सीमा 12% से 16% के बीच तय की गई है। यह प्रोत्साहन निजी और सार्वजनिक दोनों क्षेत्रों की कंपनियों को नए संयंत्र स्थापित करने के लिए प्रेरित करेगा।
  3. विदेशी मुद्रा जोखिम से सुरक्षा: सरकार ने फॉरेक्स रिस्क मिटिगेशन का प्रावधान किया है। इसके तहत डॉलर में होने वाली फिक्स्ड लागत को चार साल बाद भारतीय रुपये में कन्वर्ट किया जाएगा। इससे विनिमय दर में उतार-चढ़ाव का असर कंपनियों और सरकारी खजाने पर कम पड़ेगा।

हर प्लांट से ₹250 करोड़ की बचत का अनुमान इस नई नीति के लागू होने से न केवल उत्पादन बढ़ेगा बल्कि वित्तीय दक्षता भी आएगी। अश्विनी वैष्णव के अनुसार, इस पॉलिसी से प्रत्येक नए प्लांट पर लगभग ₹250 करोड़ की बचत होने का अनुमान है। इससे न केवल प्रोजेक्ट की लागत कम होगी, बल्कि सब्सिडी प्रबंधन भी पहले से अधिक स्थिर और अनुमानित हो सकेगा।

यह कदम आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है, जिससे भविष्य में यूरिया के लिए दूसरे देशों पर निर्भरता काफी हद तक कम हो जाएगी।

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