NCP में पावर वॉर छिड़ा: सुनेत्रा पवार को सीनियर नेता का 7 पन्नों का कानूनी नोटिस, पार्टी में खलबली
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राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) में अजित पवार के निधन के बाद शुरू हुआ नेतृत्व परिवर्तन अब खुलकर सड़क पर आ गया है। पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुनेत्रा पवार को वरिष्ठ नेता और राष्ट्रीय सचिव सच्चिदानंद सिंह द्वारा भेजे गए 7 पन्नों के कानूनी नोटिस ने संगठन की अंदरूनी कलह को जगजाहिर कर दिया है।

कानूनी नोटिस: सुनेत्रा पवार के चुनाव को दी चुनौती

सचिनदानंद सिंह ने अपने नोटिस में 26 फरवरी 2026 को आयोजित राष्ट्रीय अधिवेशन की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं। नोटिस में दावा किया गया है कि सुनेत्रा पवार का चुनाव पार्टी के संविधान के खिलाफ है। आरोप है कि अजित पवार के निधन के बाद कार्यकारी अध्यक्ष प्रफुल पटेल को जिम्मेदारी मिलनी चाहिए थी, लेकिन नियमों को दरकिनार कर आनन-फानन में अध्यक्ष पद का चुनाव कराया गया। सिंह ने इस चुनाव को अवैध, शून्य और अस्तित्वहीन घोषित करने की मांग की है।

क्या प्रफुल पटेल के लिए खुला मोर्चा?

इस कानूनी नोटिस में प्रफुल पटेल की भूमिका को संवैधानिक रूप से महत्वपूर्ण बताया गया है, जिससे राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है कि पार्टी का एक बड़ा धड़ा अभी भी पटेल को अपना नेता मानता है। दिलचस्प बात यह है कि खुद प्रफुल पटेल ने भी पहली बार पार्टी के भीतर मतभेदों को स्वीकार करते हुए सुधारात्मक कदम उठाने की बात कही है।

पार्थ पवार का बढ़ता प्रभाव बना विवाद की जड़?

पार्टी सूत्रों के अनुसार, अजित पवार के निधन के बाद पार्थ पवार का संगठन में बढ़ता हस्तक्षेप कई वरिष्ठ नेताओं को नागवार गुजर रहा है। पुराने नेताओं का मानना है कि महत्वपूर्ण फैसलों में अब उनकी राय को दरकिनार किया जा रहा है। यही असंतोष अब कानूनी नोटिस के रूप में बाहर आया है।

शरद पवार की सक्रियता और अनिश्चित भविष्य

यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब महाराष्ट्र की सियासत में बड़े बदलाव की अटकलें हैं। शरद पवार की हालिया मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के साथ मुलाकात ने इन चर्चाओं को हवा दी है कि भविष्य में नए राजनीतिक समीकरण बन सकते हैं। हालांकि, इन अटकलों पर अभी तक कोई आधिकारिक मुहर नहीं लगी है।

आगे क्या होगा?

सुनेत्रा पवार ने इस मुद्दे पर खुद बोलने के बजाय पार्टी नेता सुनील तटकरे को अधिकृत किया है। अब एनसीपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह इस कानूनी लड़ाई को कैसे सुलझाती है। क्या पार्टी केवल कानूनी जवाब देगी या संगठन के भीतर बगावत को रोकने के लिए कोई बड़ा राजनीतिक फैसला लेगी? यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा, लेकिन फिलहाल इतना तय है कि एनसीपी में नेतृत्व की जंग अब किसी भी समय बड़ा धमाका कर सकती है।

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