क्या ईरान की सैन्य ताकत पूरी तरह खत्म? राष्ट्रपति ट्रंप के दावों से मचा हड़कंप
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अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने दुनिया को एक बार फिर युद्ध की कगार पर खड़ा कर दिया है। लगातार तीन दिनों तक अमेरिकी हमलों के बाद, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान की सैन्य क्षमता को लेकर बेहद चौंकाने वाले दावे किए हैं। ट्रंप का कहना है कि ईरान अब पहले जैसा नहीं रहा और उसकी युद्ध करने की क्षमता लगभग समाप्त हो चुकी है।

मिडिल ईस्ट का दादा बनने का दौर खत्म

ट्रंप ने प्रेस वार्ता में कहा कि चार महीने पहले तक ईरान की सेना को मिडिल ईस्ट में सबसे शक्तिशाली माना जाता था, लेकिन अब पूरी तस्वीर बदल चुकी है। उन्होंने दावा किया कि ईरान की नौसेना लगभग खत्म हो गई है। ट्रंप के अनुसार, ईरान के 159 जहाज समुद्र में डूब चुके हैं और उनके 230 लड़ाकू विमानों का नामोंनिशान मिटा दिया गया है।

रडार और एयर-डिफेंस सिस्टम भी ढहाए

सिर्फ जहाजों और विमानों तक ही सीमित नहीं, ट्रंप ने यह भी दावा किया कि ईरान का अत्याधुनिक रडार सिस्टम और एंटी-एयरक्राफ्ट सिस्टम भी अमेरिकी बमबारी में तबाह हो गया है। ट्रंप ने इसे नेतृत्व का पतन करार दिया है। उन्होंने कहा कि ईरान के पहले और दूसरे दर्जे के नेता पहले ही मारे जा चुके हैं और अब तीसरे दर्जे की लीडरशिप भी गंभीर संकट में है।

आर्थिक कंगाली और 350% महंगाई

सैन्य तबाही के साथ-साथ ट्रंप ने ईरान की गिरती अर्थव्यवस्था की भी पोल खोली। उन्होंने बताया कि मात्र चार महीने पहले ईरान में महंगाई दर 5% थी, जो अब बढ़कर 350% से अधिक हो गई है। ट्रंप का आरोप है कि ईरान ने बार-बार समझौतों को तोड़ा और अमेरिकी नागरिकों की जान ली है।

52,000 प्रदर्शनकारियों की मौत का गंभीर आरोप

एक बेहद गंभीर आरोप लगाते हुए ट्रंप ने कहा कि ईरान सरकार ने अपने ही देश के 52,000 प्रदर्शनकारियों को मौत के घाट उतार दिया है। उन्होंने सवाल किया कि क्या दुनिया ने कभी इतने बड़े पैमाने पर किसी देश में अंतिम संस्कार देखे हैं? ट्रंप ने दावा किया कि उनकी सरकार ने ईरान को इस स्थिति में ला दिया है कि अब वे कोई भी आक्रामक कदम उठाने की स्थिति में नहीं हैं।

आखिर क्यों नहीं टिक पाया सीजफायर?

ईरान और अमेरिका के बीच हालिया तनाव की मुख्य वजह आपसी अविश्वास है। जानकारों का मानना है कि ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों और अमेरिका समर्थित सैन्य अभियानों के कारण ईरान अपनी घरेलू राजनीति को बचाने के लिए आक्रामक रुख अपना रहा है। वहीं, अमेरिका का दावा है कि ईरान के क्षेत्रीय हस्तक्षेपों को रोकने के लिए सैन्य दबाव ही एकमात्र रास्ता है, जिसके कारण शांति समझौता कागजों तक ही सीमित रह गया।

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