यूरोप की ठंडी वादियों से बिहार की टूर पॉलिटिक्स : क्या तेजस्वी यादव ने जनता का भरोसा खो दिया है?
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बिहार की राजनीति में बांकीपुर उपचुनाव की सरगर्मी तेज है, लेकिन मुख्य विपक्षी पार्टी राष्ट्रीय जागृत दल (आरजेडी) के नेता तेजस्वी यादव इन दिनों बिहार से हजारों मील दूर यूरोप में अपनी छुट्टियां मना रहे हैं। प्रदेश में एक के बाद एक हो रही हिंसक घटनाएं और हत्याएं उनके टूर पॉलिटिक्स पर गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं।

बंटी यादव की वीभत्स हत्या और तेजस्वी का फोन कॉल समाधान हाल ही में पटना में सेक्स रैकेट का विरोध करने वाले बंटी यादव की निर्मम हत्या कर दी गई। अपराधियों ने न केवल उसे अगवा किया, बल्कि बख्तियारपुर-मोकामा फोरलेन के पास ले जाकर उसकी हत्या कर दी और शव को अथमलगोला में दफन कर दिया। पहचान मिटाने के लिए उसके हाथों के टैटू तक खरोंच दिए गए। इस दुखद घड़ी में, जब पीड़ित परिवार को नेता प्रतिपक्ष के साथ की जरूरत थी, तेजस्वी यादव ने यूरोप से महज एक फोन कॉल कर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली।

क्या ए टू जेड का नारा सिर्फ दिखावा है? तेजस्वी यादव का ए टू जेड का नारा अब सवालों के घेरे में है। पूर्व में भरत भूषण तिवारी के एनकाउंटर के बाद भी तेजस्वी की चुप्पी ने यह साफ कर दिया कि उनकी राजनीति जातिगत समीकरणों से बाहर नहीं निकल पा रही है। जहां एक ओर चिराग पासवान जैसे नेता सत्ता में रहकर भी पीड़ित परिवारों के साथ खड़े नजर आते हैं, वहीं तेजस्वी का फोन कॉल तक सीमित रहना उनकी जमीनी पकड़ को कमजोर करता है।

सोशल मीडिया बनाम जमीन की राजनीति आरजेडी का गौरवशाली इतिहास लालू प्रसाद यादव के जमीन पर संघर्ष से बना था। इसके विपरीत, तेजस्वी यादव का पूरा राजनीतिक सफर सोशल मीडिया रील और एसी कमरों तक सिमटता दिख रहा है। चाहे कोरोना काल हो या राज्य के बड़े राजनीतिक घटनाक्रम, तेजस्वी की अनुपस्थिति ने उन्हें एक वर्चुअल लीडर के रूप में स्थापित कर दिया है।

सीखने का समय: अखिलेश यादव से क्या ले सकते हैं सबक? उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव ने यादव-मुस्लिम की छवि से बाहर निकलने के लिए टिकट वितरण में जो साहस दिखाया, उसका लाभ उन्हें दलित और गैर-यादव ओबीसी वोटों के रूप में मिला। तेजस्वी यादव को भी यह समझने की जरूरत है कि बिहार की जनता ने उन्हें सत्ता भले न दी हो, लेकिन मुख्य विपक्षी दल के रूप में जनता की आवाज बनने का जो जनादेश दिया है, उसे केवल ट्विटर और विदेश से नहीं निभाया जा सकता।

निष्कर्ष तेजस्वी यादव का लगातार विदेश टूर पर रहना और राज्य की भयंकर घटनाओं पर केवल सोशल मीडिया प्रतिक्रिया देना बिहार की जनता को यह सोचने पर मजबूर कर रहा है कि क्या आरजेडी ने अपनी वैचारिक नींव खो दी है। यदि तेजस्वी को 2025 या भविष्य की राजनीति में अपनी साख बचानी है, तो उन्हें यूरोप की ठंडी वादियों को छोड़कर बिहार की तपती सड़कों पर जनता के दुख-दर्द में शामिल होना होगा।

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