हम मंदिर में लेने नहीं, अर्पण करने जाते हैं: रामटेक मंदिर ट्रस्ट बिल पर वरुण सरदेसाई का कड़ा प्रहार
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नागपुर में चल रहे विधानसभा सत्र के दौरान रामटेक के ऐतिहासिक श्री राम मंदिर ट्रस्ट से जुड़ा नया विधेयक विवादों के घेरे में आ गया है। युवा सेना नेता और विधायक वरुण सरदेसाई ने इस बिल के प्रावधानों को हिंदू परंपराओं के खिलाफ बताते हुए सरकार को आड़े हाथों लिया है।

खुद ही बिल लाओ, खुद ही सदस्य बन जाओ

सरदेसाई ने बिल में स्थानीय विधायक आशीष जायसवाल को ट्रस्ट का सदस्य बनाए जाने पर सवाल उठाए। उन्होंने कटाक्ष करते हुए पूछा कि क्या यह भाग्य है या हितों का टकराव ?

उन्होंने सरकार से चुनौती देते हुए कहा कि यदि मंदिरों में स्थानीय जनप्रतिनिधियों को रखना ही है, तो यही नियम मुंबई के सिद्धिविनायक मंदिर समेत अन्य प्रसिद्ध मंदिरों पर भी लागू किया जाए। उन्होंने दो टूक कहा, राम अलग-अलग नहीं हो सकते, तो नियम अलग क्यों हैं?

भक्ति का प्रमाण पत्र कौन जारी करेगा?

बिल के एक प्रावधान पर सरदेसाई ने कड़ी आपत्तियां जताई हैं, जिसके तहत ट्रस्टी बनने के लिए हलफनामा देना होगा कि वह श्री राम का भक्त है ।

सरदेसाई ने सदन में पूछा कि इस भक्ति की सत्यता की जांच कौन करने वाला है? आखिर इसे मापने का मानदंड क्या है और इसका जज कौन होगा? उन्होंने इसे व्यक्तिगत आस्था के साथ खिलवाड़ करार दिया।

विश्वस्त पद का व्यावसायीकरण गलत

सबसे बड़ा विवाद ट्रस्टियों को मिलने वाले मानदेय और भत्तों को लेकर है। बिल के अनुसार, ट्रस्ट के पदाधिकारियों को मानधन और दैनिक भत्ता दिया जाएगा।

इस पर तल्ख टिप्पणी करते हुए सरदेसाई ने कहा, हम मंदिर में कुछ लेने नहीं, बल्कि प्रभु के चरणों में कुछ अर्पित करने जाते हैं। विश्वस्त का पद सेवा और सम्मान का होता है, न कि वेतन या भत्ते कमाने का। उन्होंने मांग की कि इस आर्थिक क्लॉज को तुरंत बिल से हटाया जाए।

गरिमा बनाम राजनीति

वरुण सरदेसाई ने स्पष्ट किया कि मंदिर की पवित्रता और गरिमा सर्वोपरि है। उन्होंने सरकार से सवाल किया है कि क्या धार्मिक ट्रस्टों में राजनीतिक नियुक्तियों और आर्थिक लाभ के प्रावधानों को शामिल करना उचित है?

इस मुद्दे ने विधानसभा में एक नई बहस को जन्म दे दिया है कि क्या अब मंदिरों की व्यवस्था को व्यावसायिक रंग दिया जा रहा है। अब देखना यह है कि सरकार इन कड़े सवालों का क्या जवाब देती है।

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