महासचिव की विदाई, कोषाध्यक्ष पर सवाल: राम मंदिर दान चोरी मामले में ट्रस्ट का बड़ा एक्शन
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अयोध्या: राम मंदिर में हुए दान चोरी कांड पर श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने बड़ा फैसला लेते हुए महासचिव चंपत राय और सदस्य डॉ. अनिल मिश्रा का इस्तीफा स्वीकार कर लिया है। चोरी की घटना के 21 दिन बाद हुई इस बैठक में ट्रस्ट ने कई अहम निर्णय लिए, लेकिन इस कार्रवाई ने कई नए सवाल भी खड़े कर दिए हैं।

बैठक में क्या हुआ? महंत नृत्य गोपाल दास की अध्यक्षता में हुई इस उच्च स्तरीय बैठक में संतों और ट्रस्ट के सदस्यों ने मंदिर में हुई चोरी पर गहरा आक्रोश जताया। स्वामी परमानंद गिरी महाराज और स्वामी विश्व प्रसन्न तीर्थ जैसे सदस्यों ने इसे केवल चोरी नहीं, बल्कि राम भक्तों की आस्था के साथ खिलवाड़ और कलंक करार दिया। आक्रोश के बीच चंपत राय और डॉ. अनिल मिश्रा की विदाई तय कर दी गई।

कोषाध्यक्ष पर उठते सवाल इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरी की भूमिका पर है। एक ओर उन्होंने चंपत राय को ईमानदार बताते हुए क्लीन चिट दी, तो दूसरी ओर खुद को भी निर्दोष घोषित किया। सवाल यह है कि यदि वे कोषाध्यक्ष हैं और उनके अधीन विभाग में चोरी हुई है, तो वे अपनी नैतिक जिम्मेदारी से कैसे बच सकते हैं?

क्यों निशाने पर हैं कोषाध्यक्ष? स्वामी गोविंद देव गिरी ने एक सार्वजनिक पत्र लिखकर तर्क दिया कि वे बैंक खातों के अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता नहीं हैं। लेकिन आलोचकों का कहना है कि यदि उनके पास कोई अधिकार नहीं था, तो वे इतने लंबे समय तक इस पद पर क्यों बने रहे? बैठक में भी उनकी भूमिका पर सवाल उठाए गए, जिसका जवाब देने के बजाय उन्होंने मीडिया की निष्पक्ष रिपोर्टिंग पर ही सवाल खड़े कर दिए।

नया अंतरिम महासचिव और जांच ट्रस्ट ने पूर्व वन सेवा अधिकारी कृष्ण मोहन को अंतरिम महासचिव नियुक्त किया है। कृष्ण मोहन वही व्यक्ति हैं जिनकी लिखित शिकायत पर दान चोरी मामले में 8 कर्मचारियों के खिलाफ केस दर्ज हुआ था। अब उन पर ट्रस्ट की साख बहाल करने और वित्तीय पारदर्शिता लाने की बड़ी चुनौती है।

अंधाधुंध कमाई और अपराधियों का जाल जांच में खुलासा हुआ है कि आरोपी कर्मचारी अनुकल्प मिश्र ने चोरी के पैसों से करोड़ों की संपत्ति जमा कर रखी थी। उसने गांव में 20 बीघा जमीन, लखनऊ में प्लाट और नोएडा में फ्लैट खरीदने के साथ-साथ अपने रिश्तेदारों को भी आर्थिक लाभ पहुँचाया था। हालांकि, कानून का शिकंजा कसते ही अब वही परिजन उससे पल्ला झाड़ रहे हैं।

लेखा-जोखा सार्वजनिक दबाव में आए ट्रस्ट ने अब दान का पूरा ब्यौरा जारी किया है। रिपोर्ट के अनुसार, अब तक 582 करोड़ रुपये का चढ़ावा मिला है, जिसमें से 391 करोड़ रुपये मंदिर संचालन और प्रशासनिक कार्यों पर खर्च हुए हैं। वहीं, निर्माण कार्य के लिए मिले 3,264 करोड़ रुपये में से 2,370 करोड़ रुपये अभी तक खर्च किए जा चुके हैं।

फिलहाल, इस मामले के मुख्य आरोपियों से एसआईटी गहन पूछताछ कर रही है। मंदिर प्रशासन में हुए इस बदलाव के बाद अब सबकी नजर इस बात पर है कि क्या नया प्रबंधन मंदिर की खोई हुई विश्वसनीयता को वापस ला पाएगा?

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