बांकीपुर में पीके का बड़ा दांव: क्या बीजेपी के अभेद्य किले में सेंध लगा पाएंगे प्रशांत किशोर?
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बिहार की राजनीति में एक नया मोड़ आता दिख रहा है। जन सुराज पार्टी के प्रमुख प्रशांत किशोर ने पटना की हाई-प्रोफाइल बांकीपुर विधानसभा सीट से उपचुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है। पार्टी की कोर कमेटी में लिए गए इस फैसले ने राज्य के सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है।

बीजेपी का अभेद्य किला और पीके की चुनौती बांकीपुर सीट को बीजेपी का सबसे मजबूत गढ़ माना जाता है। पूर्व विधायक नितिन नबीन के पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद खाली हुई इस सीट पर 30 जुलाई को मतदान होगा, जबकि 3 अगस्त को नतीजे आएंगे। नितिन नबीन और उनके परिवार का इस क्षेत्र पर 2006 से वर्चस्व रहा है। ऐसे में प्रशांत किशोर का इस सीट को चुनना एक साहसी और रणनीतिक कदम माना जा रहा है।

रणनीति: मोदी तक संदेश पहुंचाने का माध्यम प्रशांत किशोर ने सीधे तौर पर मतदाताओं से अपील की है कि वे बीजेपी को हराकर शीर्ष नेतृत्व तक यह संदेश पहुंचाएं कि वे सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाए जाने से खुश नहीं हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पीके उन अगड़ी जातियों के वोट बैंक को साधने की कोशिश कर रहे हैं जो वर्तमान नेतृत्व से नाराज हो सकते हैं।

हारने के लिए कुछ नहीं, सुर्खियों के लिए बहुत कुछ वरिष्ठ पत्रकारों का कहना है कि प्रशांत किशोर के पास खोने को कुछ नहीं है, लेकिन इस उपचुनाव के जरिए वह खुद को फिर से प्रासंगिक बनाने की कोशिश में हैं। जिस तरह अरविंद केजरीवाल ने 2014 में बनारस से चुनाव लड़कर राष्ट्रीय सुर्खियां बटोरी थीं, पीके भी बांकीपुर को एक बड़ा राजनीतिक मंच बनाने की जुगत में हैं।

क्या है गणित? बांकीपुर की खास बात यह है कि यहां अर्बन अपैथी (शहरी उदासीनता) के चलते वोटिंग प्रतिशत काफी कम रहता है। पिछले चुनाव में बीजेपी को महज 25% वोट मिले थे। प्रशांत किशोर का मानना है कि यदि वे बचे हुए 75% मतदाताओं को जुटा सकें, तो खेल बदल सकता है। साथ ही, बीजेपी के पास इस सीट पर फिलहाल कोई बड़ा स्थानीय चेहरा नहीं है, जिसका फायदा किशोर उठाना चाहते हैं।

जन सुराज की साख का सवाल 2025 के विधानसभा चुनावों में जन सुराज पार्टी का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक था, जहां उनके 238 में से 236 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी। प्रशांत किशोर खुद पिछले चुनावों में मैदान से हट गए थे, लेकिन इस बार वे खुद मैदान में हैं। क्या वे अपनी रणनीति और प्रभाव से बीजेपी के इस पारंपरिक किले को ढहा पाएंगे, या बांकीपुर का परिणाम उनकी राजनीतिक पारी के लिए एक और कठिन सबक साबित होगा? 3 अगस्त को होने वाली मतगणना ही इसका असली जवाब देगी।

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