तोप का लाइसेंस मांग रहे राजभर को मिलेगा कट्टा ? एनडीए की बैठक के बाद सियासी बयानबाजी तेज
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लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपने बेबाक बयानों से सुर्खियां बटोरने वाले सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के मुखिया ओम प्रकाश राजभर एक बार फिर चर्चा में हैं। रविवार को भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव और यूपी प्रभारी नितिन नवीन के साथ हुई एनडीए नेताओं की बैठक के बाद राजभर का तोप और कट्टे वाला बयान सियासी गलियारों में गूंज रहा है।

क्या तोप मांग रहे राजभर? बैठक से बाहर निकलते ही जब पत्रकारों ने राजभर से सीटों के बंटवारे को लेकर सवाल किया, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, लोग तोप का लाइसेंस मांगते हैं तो कट्टा ही मिलता है। राजभर का यह बयान भले ही हल्के-फुल्के अंदाज में दिया गया हो, लेकिन इसके गहरे राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं।

दबाव की राजनीति या हताशा? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राजभर इस बयान के जरिए भाजपा आलाकमान को संदेश देना चाहते हैं कि आगामी 2027 विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी बड़ी हिस्सेदारी की उम्मीद कर रही है। हालांकि, वे यह भी भली-भांति जानते हैं कि गठबंधन में बड़ी मछली हमेशा भाजपा ही होती है और अंततः उन्हें भाजपा की शर्तों पर ही समझौता करना पड़ सकता है।

मौसम वैज्ञानिक का पुराना इतिहास ओम प्रकाश राजभर को पूर्वांचल की राजनीति का मौसम वैज्ञानिक कहा जाता है। 2017 में भाजपा के साथ सरकार का हिस्सा रहे राजभर, 2022 में अखिलेश यादव के साथ आए और फिर 2024 में वापस एनडीए में शामिल हो गए। उनका यह पलटीमार इतिहास बताता है कि वे अपनी सुविधा और राजनीतिक लाभ के अनुसार अपने पाले बदलने में माहिर हैं।

अपनी पहचान बनाए रखने की जंग राजभर ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वे अपनी पार्टी के सिंबल छड़ी पर ही चुनाव लड़ेंगे। यह बयान महत्वपूर्ण है क्योंकि अक्सर बड़े दल छोटे सहयोगियों को अपने सिंबल पर चुनाव लड़ने का दबाव बनाते हैं। राजभर जानते हैं कि पूर्वांचल की करीब 25 से 30 सीटों पर उनकी जाति का वोट बैंक निर्णायक है, इसलिए वे भाजपा के सामने अपनी शर्तों पर अड़े रहना चाहते हैं।

भविष्य की बिसात अब सवाल यह है कि नितिन नवीन के साथ हुई बंद कमरे की बैठक में क्या तय हुआ? क्या राजभर की तोप जैसी मांगों को भाजपा स्वीकार करेगी या उन्हें पुराने अनुभवों की तरह सीमित सीटों (कट्टे) पर ही संतोष करना पड़ेगा? फिलहाल, राजभर की यह मुस्कान और उनके शब्द यूपी एनडीए के भीतर चल रही सीट शेयरिंग की खींचतान को उजागर करने के लिए काफी हैं।

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