अक्षरधाम के 25 गौरवशाली वर्ष: दिल्ली की सांस्कृतिक पहचान बना आस्था का यह महाकुंभ
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2 जुलाई 2001 को यमुना के तट पर एक ऐसी नींव रखी गई थी, जिसने देखते ही देखते दिल्ली के मानचित्र को ही बदल दिया। आज अक्षरधाम मंदिर को स्थापित हुए 25 साल पूरे हो चुके हैं। इस सफर की शुरुआत परम पावन प्रमुख स्वामी महाराज द्वारा रखे गए पहले तराशे हुए पत्थर के साथ हुई थी, जो आज लाखों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुका है।

अद्भुत स्थापत्य और भव्यता का मेल गुलाबी बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर से निर्मित यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि स्थापत्य कला का एक बेजोड़ नमूना है। इसमें मौजूद 20,000 तराशी हुई आकृतियां इसकी बारीकियों को बयां करती हैं। हाल ही में स्थापित 108 फुट ऊंची नीलकंठ वर्णी की कांस्य प्रतिमा ने इस परिसर की भव्यता में चार चांद लगा दिए हैं। इसका आकार हुमायूं के मकबरे और जामा मस्जिद के समकक्ष है, जो इसे शहर के प्रमुख स्मारकों में शामिल करता है।

दिल्ली के इतिहास में मंदिरों का स्थान दिल्ली का गौरवशाली इतिहास सदियों से इस्लामिक राजवंशों के किलों, मस्जिदों और मकबरों की गवाही देता रहा है। लेकिन, बीते एक दशक में दिल्ली ने अपनी सांस्कृतिक जड़ों को दोबारा पुख्ता किया है। अक्षरधाम जैसे मंदिरों ने यह साबित किया है कि आधुनिक दिल्ली के पास अब अपने नए धरोहर हैं, जो न केवल आस्था का केंद्र हैं, बल्कि स्थापत्य कला की नई मिसाल भी हैं।

राजधानी की अन्य स्थापत्य धरोहरें दिल्ली के आध्यात्मिक मानचित्र पर अक्षरधाम के अलावा भी कई ऐसे मंदिर हैं, जिन्होंने शहर की खूबसूरती को बढ़ाया है। 1939 में खुला बिड़ला मंदिर हो, ग्रीन पार्क का सफेद संगमरमरी श्री जगन्नाथ मंदिर हो या फिर ईस्ट ऑफ कैलाश का भव्य इस्कॉन मंदिर; इन सभी ने 20वीं सदी में दिल्ली के बदलते स्वरूप को आकार दिया है।

एक विहंगम दृश्य अक्षरधाम का सबसे मनमोहक रूप नोएडा मोड़ के पास हाईवे से दिखाई देता है। शाम के समय जब सूरज मंदिर के शिखरों के पीछे ढलता है, तो यह दृश्य किसी दिव्य अनुभूति से कम नहीं होता। 25 वर्षों के इस सफर में अक्षरधाम ने न केवल दिल्ली बल्कि पूरी दुनिया को भारतीय संस्कृति और कला के एक अनूठे संगम से रूबरू कराया है।

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