फणीश्वरनाथ रेणु के जीवन पर बनेगी फिल्म: मैंने लाखों के बोल सहे के जरिए पर्दे पर उतरेगी साहित्य की आत्मा
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हिंदी साहित्य के महान कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु का जीवन अब बड़े पर्दे पर जीवंत होने जा रहा है। ‘उगना इंटरटेनमेंट’ के बैनर तले फिल्म ‘रेणु’ के निर्माण की घोषणा की गई है। इस फिल्म का उद्देश्य सिर्फ एक लेखक की जीवनी दिखाना नहीं, बल्कि उनकी विचारधारा, संघर्ष और भारतीय ग्रामीण समाज की उस रूह को कैद करना है, जिसे रेणु ने अपनी कालजयी रचनाओं में पिरोया था।

फिल्म की टैगलाइन ‘मैंने लाखों के बोल सहे’ रखी गई है। फिलहाल इसकी शूटिंग की तैयारी जोरों पर है और इसे अगले साल मार्च में रिलीज करने का लक्ष्य रखा गया है।

सांसद प्रदीप कुमार सिंह का ड्रीम प्रोजेक्ट अररिया के सांसद प्रदीप कुमार सिंह ने इसे अपना ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ बताया है। उनका मानना है कि फणीश्वरनाथ रेणु ने अररिया को वैश्विक पहचान दिलाई है। सांसद ने कहा कि इस फिल्म के जरिए देश भर के लोग समझ पाएंगे कि कैसे एक लेखक ने गांव, खेत और किसानों की समस्याओं को साहित्य के केंद्र में लाकर समाज और राजनीति को प्रभावित किया।

केवल लेखक नहीं, एक जन-आंदोलन का नाम फिल्म से जुड़ी राया सिन्हा का कहना है कि रेणु सिर्फ कलम के धनी नहीं थे, वे एक आंदोलन थे। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया और बाद में जेपी आंदोलन के दौरान भ्रष्टाचार के खिलाफ मुखर रहे। फिल्म में उनके इस संघर्षपूर्ण सफर को प्रामाणिक तरीके से दिखाया जाएगा।

गहन रिसर्च से तैयार हुई पटकथा ढाई घंटे की इस फिल्म के लिए पिछले छह से सात महीनों से लगातार शोध किया गया है। राया सिन्हा ने बताया कि उनके पिता, जो राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता हैं, के मार्गदर्शन में पटकथा को अंतिम रूप दिया गया है। फिल्म की पटकथा तैयार करने के लिए रेणु के जीवन से जुड़े हर छोटे-बड़े पहलुओं का बारीकी से अध्ययन किया गया है।

सांस्कृतिक पहचान और नई पीढ़ी की जिम्मेदारी फिल्म से जुड़े कलाकार फुल कुमार सिंह ने एक महत्वपूर्ण बात उठाई। उन्होंने कहा कि जापान, चीन और इंग्लैंड जैसे देशों के शोधकर्ता रेणु पर पीएचडी कर रहे हैं, लेकिन विडंबना यह है कि उनके अपने ही क्षेत्र के लोग उनके योगदान से पर्याप्त परिचित नहीं हैं। यह फिल्म एक सांस्कृतिक जागरूकता का काम करेगी।

सीमांचल को मिलेगा नया मंच इस फिल्म का एक बड़ा पहलू सीमांचल की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय पटल पर लाना भी है। फिल्म निर्माण में स्थानीय कलाकारों और तकनीशियनों को प्राथमिकता दी जा रही है। उम्मीद की जा रही है कि यह फिल्म न केवल रेणु की विरासत को सहेजने का काम करेगी, बल्कि अररिया और आसपास के पूरे क्षेत्र को सांस्कृतिक पर्यटन के एक नए केंद्र के रूप में भी स्थापित करेगी।

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