बिहार के भागलपुर जिले में सुल्तानगंज और अगुवानी के बीच निर्माणाधीन गंगा महासेतु के नामकरण को लेकर एक नई बहस शुरू हो गई है। सुल्तानगंज विकास संघर्ष समिति और अन्य सामाजिक संगठनों ने सरकार से इस पुल का नाम बदलकर ‘अंग महासेतु’ रखने की पुरजोर मांग की है।
ज्ञापन में तर्क दिया गया है कि यह पुल केवल कंक्रीट का ढांचा नहीं, बल्कि अंग प्रदेश की गौरवशाली विरासत का प्रतीक है। प्राचीन 16 महाजनपदों में शामिल इस क्षेत्र का इतिहास दानवीर कर्ण और समृद्ध अंगिका भाषा से जुड़ा है। समर्थकों का मानना है कि ‘अंग महासेतु’ नाम रखने से इस पूरे क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक स्तर पर एक नई प्रतिष्ठा मिलेगी।
इस मांग के पीछे सुल्तानगंज स्थित विश्व प्रसिद्ध अजगैबीनाथ धाम का धार्मिक महत्व भी एक बड़ा कारण है। पवित्र उत्तरवाहिनी गंगा के तट पर स्थित यह स्थल सावन के दौरान लाखों कांवरियों का केंद्र होता है। संगठन का कहना है कि यह क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आस्था का बड़ा केंद्र है, इसलिए पुल का नाम भी इसकी धार्मिक गरिमा के अनुरूप होना चाहिए।
सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस बात पर जोर दिया है कि बिहार के करीब 17 जिलों में अंगिका भाषा बोली जाती है, लेकिन अब तक अंग क्षेत्र के नाम पर किसी बड़ी परियोजना का नामकरण नहीं हुआ है। उन्होंने राज्य सरकार और विधानसभा से अपील की है कि भविष्य में जब भी इस महासेतु के नामकरण का प्रस्ताव आए, तो ‘अंग महासेतु’ को ही आधिकारिक स्वीकृति दी जाए।
इस बीच, सामाजिक कार्यकर्ता सन्नी कुमार चौधरी ने जिलाधिकारी अलंकृता पांडेय को ज्ञापन देकर श्रावणी मेले की तैयारियों पर ध्यान केंद्रित करने की मांग रखी है। उन्होंने घाटों पर एसडीआरएफ (SDRF) और प्रशिक्षित गोताखोरों की स्थायी तैनाती की मांग की है। हाल के दिनों में डूबने की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए यह कदम अनिवार्य बताया गया है।
मेला क्षेत्र में स्वच्छता, नालों की सफाई और पर्याप्त रोशनी की व्यवस्था करना प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती है। सुल्तानगंज में हर साल लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं, जिसे देखते हुए बुनियादी सुविधाओं में सुधार की मांग जोर-शोर से उठाई जा रही है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार महासेतु के नामकरण और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर क्या ठोस कदम उठाती है।
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— Prabhat Khabar (@prabhatkhabar) June 24, 2026
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