40°C में क्यों पिघल जाती हैं ब्रिटेन की सड़कें, जबकि 50°C की आग भी झेल जाता है भारत?
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यूरोप इन दिनों भीषण हीटवेव की चपेट में है। इस दौरान ब्रिटेन से हैरान करने वाली तस्वीरें सामने आ रही हैं, जहां डामर की सड़कें नरम पड़कर पिघलने लगी हैं। यह सवाल खड़ा करता है कि जब भारत में तापमान अक्सर 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है, तब भी यहां की सड़कें सुरक्षित कैसे रहती हैं? क्या भारत की इंजीनियरिंग ब्रिटेन से बेहतर है? आइए इसके वैज्ञानिक कारण को समझते हैं।

UK की सड़कों का कोल्ड-वेदर डिजाइन ब्रिटेन और यूरोप के अन्य ठंडे देशों में सड़कें लंबे समय तक रहने वाली जमा देने वाली ठंड को झेलने के लिए बनाई जाती हैं। यहाँ सड़कों के निर्माण में नरम ग्रेड के बिटुमेन का उपयोग किया जाता है। इसका मकसद सड़क को लचीला बनाना होता है ताकि शून्य से नीचे तापमान में भी सड़क में दरारें न पड़ें। वहां की सड़कें फ्रीज-थॉ (जमने और पिघलने) के चक्र को सहने के लिए डिजाइन की गई हैं, जो वहां की मुख्य चुनौती है।

भारत की सड़कों का हीट-रेजिस्टेंट फॉर्मूला इसके विपरीत, भारत की भौगोलिक स्थिति और जलवायु पूरी तरह अलग है। भारतीय सड़कों के निर्माण में सख्त VG-ग्रेड बिटुमेन (जैसे VG-30 और VG-40) का उपयोग किया जाता है। इस सामग्री की विस्कोसिटी (गाढ़ापन) बहुत अधिक होती है। यह मिश्रण विशेष रूप से तपा देने वाली गर्मी और भारी ट्रैफिक के दबाव को झेलने के लिए तैयार किया जाता है। यही कारण है कि 45-50 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी भारतीय सड़कें अपना आकार नहीं खोतीं।

सड़क इंजीनियरिंग का असली विज्ञान सड़कों के पिघलने या न पिघलने का संबंध निर्माण की गुणवत्ता से कम और स्थानीय जलवायु की जरूरतों से अधिक है। यदि भारत जैसी तकनीक ब्रिटेन में इस्तेमाल की जाए, तो वहां की सड़कें कड़ाके की ठंड में कांच की तरह चटक जाएंगी। वहीं, अगर ब्रिटेन जैसी तकनीक का उपयोग भारत में किया जाए, तो 40 डिग्री की गर्मी में ही सड़कें पिघलकर गड्ढों में तब्दील हो जाएंगी।

निष्कर्ष: अनुकूलन ही कुंजी है संक्षेप में, ब्रिटेन की सड़कें ठंड के लिए बनी हैं और भारत की सड़कें गर्मी के लिए। ब्रिटेन में 40 डिग्री तापमान वहां के सामान्य औसत से बहुत अधिक है, जिसके लिए वहां का इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार नहीं था। वहीं, भारत में हम हर साल भीषण गर्मी का सामना करते हैं, इसलिए हमारी सड़कें उसी हिसाब से हीट-प्रूफ ढाल के साथ बनाई जाती हैं। यह किसी के बेहतर या बदतर होने का सवाल नहीं, बल्कि इंजीनियरिंग के अनुकूलन (Adaptation) का मामला है।

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