राम मंदिर चंदा चोरी: क्या वकील आरोपियों का केस लड़ने से मना कर सकते हैं? कानून क्या कहता है?
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अयोध्या में राम मंदिर के चढ़ावे में कथित गबन का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। इस मामले में गिरफ्तार किए गए आठ आरोपियों को लेकर स्थानीय बार एसोसिएशन ने एक कड़ा फैसला लिया है। एसोसिएशन ने ऐलान किया है कि अयोध्या का कोई भी वकील इन आरोपियों का केस नहीं लड़ेगा।

जुर्माने की चेतावनी और ट्रस्ट के खिलाफ गुस्सा अयोध्या बार एसोसिएशन की बैठक में यह संकल्प लिया गया कि यदि कोई वकील इन आरोपियों की पैरवी करने की कोशिश करेगा, तो उस पर 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा। वकीलों का तर्क है कि मंदिर के चढ़ावे में चोरी से उनकी भावनाएं आहत हुई हैं। इतना ही नहीं, वकीलों ने मंदिर ट्रस्ट के प्रमुख सदस्यों चंपत राय, अनिल मिश्रा और गोपाल राव से अयोध्या छोड़ने की मांग की है और चेतावनी दी है कि तीन दिन में ऐसा न होने पर शहर की घेराबंदी की जाएगी।

आठ आरोपियों को 14 दिन की न्यायिक हिरासत पुलिस ने इस मामले में अविनाश शुक्ला, अनुकल्प मिश्रा, लव कुश मिश्रा समेत आठ लोगों को गिरफ्तार किया है। सोमवार को कोर्ट ने इन सभी को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया है। बार एसोसिएशन के सचिव शैलेंद्र जायसवाल ने स्पष्ट किया है कि यह फैसला सर्वसम्मति से लिया गया है।

संविधान और सुप्रीम कोर्ट का रुख क्या है? भारतीय संविधान का अनुच्छेद 22(1) हर आरोपी को अपनी पसंद के वकील के जरिए बचाव का मौलिक अधिकार देता है। वहीं, 2010 के ऐतिहासिक फैसले एएस मोहम्मद रफी बनाम तमिलनाडु में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा था कि बार एसोसिएशन द्वारा किसी आरोपी का केस न लड़ने का प्रस्ताव पारित करना न केवल असंवैधानिक है, बल्कि कानूनी समुदाय के लिए शर्मनाक भी है।

क्या बार एसोसिएशन वकीलों को रोक सकते हैं? कानूनी जानकारों के अनुसार, बार एसोसिएशन का किसी वकील पर जुर्माना लगाने या उसे केस लड़ने से रोकने का प्रस्ताव पूरी तरह से अवैध है। सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाई कोर्ट (जैसे उत्तराखंड और कर्नाटक) पहले ही कह चुके हैं कि वकील का काम आरोपी का पक्ष रखना है, चाहे अपराध कुछ भी हो। वकील स्वयं केस न लेने का फैसला कर सकते हैं, लेकिन अन्य वकीलों को डराना या उन पर जुर्माना लगाना अदालत की कार्यवाही में बाधा डालने जैसा है, जो कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट (अदालत की अवमानना) की श्रेणी में आता है।

निष्कर्ष भले ही अयोध्या के वकील अपनी भावनाओं के कारण आरोपियों का बचाव न करने का फैसला ले रहे हों, लेकिन भारतीय कानून और प्रोफेशनल एथिक्स के तहत किसी भी आरोपी को कानूनी सहायता से वंचित नहीं किया जा सकता। ऐसे में देखना यह होगा कि क्या ये आरोपी बाहर से वकील लाएंगे या फिर कोर्ट अपनी ओर से उन्हें मुफ्त कानूनी सहायता (Legal Aid) प्रदान करेगा।

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