ब्रिटेन का संसदीय ‘एक्शन मॉडल’: क्या भारत को भी पीएम के अपमान पर सख्त कार्रवाई की जरूरत है?
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ब्रिटेन की संसद में हाल ही में घटी एक घटना ने भारत में राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने इस मुद्दे को उठाते हुए सवाल किया है कि क्यों भारत में प्रधानमंत्री पद की गरिमा के साथ खिलवाड़ करने वाले नेताओं पर वैसी कार्रवाई नहीं होती, जैसी ब्रिटेन में देखने को मिलती है।

ब्रिटेन में क्या हुआ था? अप्रैल के महीने में ब्रिटेन की संसद में एक बहस के दौरान पाकिस्तानी मूल की सांसद जारा सुल्ताना ने प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर को बेयर-फेस्ड लायर (निर्लज्ज झूठा) कह दिया था। ब्रिटिश स्पीकर लिंडसे हॉयल ने इसे संसदीय परंपराओं का उल्लंघन माना और सुल्ताना को तत्काल प्रभाव से 5 दिनों के लिए सदन से निलंबित कर दिया। वहीं, एक अन्य सांसद ली एंडरसन को भी लायर शब्द का इस्तेमाल करने पर सदन से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।

क्या है ब्रिटेन का वेस्टमिंस्टर मॉडल? ब्रिटिश संसद के नियमों के अनुसार, प्रधानमंत्री पर निजी टिप्पणियां करना पूरी तरह वर्जित है। सांसद सरकार की नीतियों की आलोचना तो कर सकते हैं, लेकिन पीएम के चरित्र या व्यक्तिगत गरिमा पर प्रहार करने पर स्पीकर को निलंबित करने का पूर्ण अधिकार है। इसे वेस्टमिंस्टर मॉडल कहा जाता है, जहाँ पद की मर्यादा सर्वोच्च है।

भारत में स्थिति का विरोधाभास केंद्रीय मंत्री रिजिजू ने सोशल मीडिया पर इस घटना का जिक्र करते हुए अफसोस जताया कि भारत में पीएम के लिए कायर , चोर , आतंकवादी और अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल आम हो गया है। उन्होंने सवाल किया, हम ब्रिटेन के संसदीय मॉडल के अनुयायी होने का दावा करते हैं, तो फिर इस तरह की भाषा पर कार्रवाई क्यों नहीं होती?

क्यों नहीं हो पाती वैसी कार्रवाई? भारतीय संसद में भी नियम 380 और 381 के तहत असंसदीय भाषा का प्रयोग प्रतिबंधित है, लेकिन कार्रवाई का स्तर काफी अलग है। भारत में अक्सर ऐसी टिप्पणियों को रिकॉर्ड से हटा दिया जाता है, लेकिन ब्रिटेन की तरह सांसद को निलंबित करने की परंपरा बहुत कम देखी गई है।

निष्कर्ष दुनिया के 34 देशों से सर्वोच्च नागरिक सम्मान प्राप्त करने वाले भारतीय प्रधानमंत्री के प्रति देश के भीतर ऐसी भाषा का इस्तेमाल एक बड़ी चिंता का विषय है। रिजिजू का तर्क है कि भारत को एक ऐसा संसदीय ढांचा तैयार करने की जरूरत है, जहाँ पीएम पद की संवैधानिक मर्यादा बनी रहे और राजनीतिक विरोध वैचारिक स्तर तक ही सीमित रहे, न कि व्यक्तिगत अपमान तक। क्या भारत अब वेस्टमिंस्टर मॉडल की तरह कठोर अनुशासन की ओर बढ़ेगा? यह बड़ा सवाल अब बहस का केंद्र है।

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