उत्तर प्रदेश पुलिस विभाग का अनुशासन और उसकी कार्यप्रणाली एक बार फिर चर्चा में है। लखनऊ पुलिस कमिश्नरेट में तैनात रहे कॉन्स्टेबल सुनील कुमार शुक्ला की बर्खास्तगी ने न केवल सुरक्षा बल के भीतर की आंतरिक व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि सोशल मीडिया बनाम विभागीय अनुशासन की नई बहस को भी जन्म दे दिया है।
कौन हैं सुनील कुमार शुक्ला? सुनील कुमार शुक्ला लखनऊ पुलिस की रिज़र्व पुलिस लाइन्स में तैनात एक सिपाही थे। मई 2026 में उन्होंने फेसबुक पर एक के बाद एक तीन वीडियो जारी किए, जिसने विभाग में खलबली मचा दी। इन वीडियो में शुक्ला ने आरोप लगाया कि लखनऊ कमिश्नरेट में भ्रष्ट सामंती व्यवस्था सक्रिय है।
क्या थे गंभीर आरोप? सुनील कुमार का दावा था कि पुलिस लाइन्स में गार्ड ड्यूटी लगाने के नाम पर हर बार 2000 रुपये की वसूली की जाती है। उन्होंने आरोप लगाया कि गार्ड कमांडर के जरिए यह पैसा सिपाही और हेड कॉन्स्टेबल से लिया जाता है, जो ऊपर तक पहुंचता है। शुक्ला के अनुसार, वहां करीब 8 लाख रुपये मासिक की उगाही का खेल चल रहा था। उन्होंने सीधे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से इस मामले में हस्तक्षेप की मांग की थी।
सोशल मीडिया बना हथियार और मुसीबत भी शुक्ला ने अपने आरोपों के समर्थन में सबूत देने के बजाय सोशल मीडिया को अपना मंच बनाया। उन्होंने आरोप लगाया कि जिन IPS अधिकारियों के खिलाफ उन्होंने शिकायत की है, उन्हीं के अधीन जांच समिति बनाना न्याय के खिलाफ है। उन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों को काले अंग्रेज तक कह डाला। विभाग ने इसे अनुशासनहीनता, आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग और विभागीय छवि धूमिल करने का मामला माना।
बर्खास्तगी का आधार 28 जून को विभाग ने सुनील कुमार शुक्ला को सेवा से बर्खास्त कर दिया। आधिकारिक बयानों के अनुसार, यह कार्रवाई निम्नलिखित कारणों से हुई:
विभाग का पक्ष: सब कुछ पारदर्शी पुलिस कमिश्नरेट ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। विभाग का कहना है कि तैनाती पूरी तरह पारदर्शी है और SOP (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर) के तहत गजेटेड अधिकारियों की देखरेख में होती है। साथ ही, विभाग ने स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार की शिकायत के लिए आंतरिक निवारण तंत्र मौजूद है, लेकिन शुक्ला ने उसे दरकिनार कर अराजकता फैलाने का रास्ता चुना।
क्या यह सिर्फ एक बर्खास्तगी है? बर्खास्तगी के बाद सुनील कुमार शुक्ला ने एक तीखे बयान में कहा, मेरी बर्खास्तगी ईस्ट इंडिया बीजेपी के विजय रथ के ताबूत की आखिरी कील साबित होगी। यह मामला अब एक कानूनी और व्यवस्थागत लड़ाई में बदल चुका है। एक तरफ जहां विभाग अनुशासन को सर्वोपरि मानकर सख्त रुख अपनाए हुए है, वहीं दूसरी ओर शुक्ला का मामला पुलिस तंत्र के भीतर व्याप्त कथित भ्रष्टाचार और जवानों की दबी हुई आवाज की ओर इशारा करता है।
यह घटना दर्शाती है कि जब व्यवस्था के भीतर का व्यक्ति अपनी ही प्रणाली के खिलाफ खड़ा होता है, तो उसका अंत अक्सर करियर के खात्मे के रूप में होता है, लेकिन यह समाज में पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर नए सवाल जरूर छोड़ जाता है।
*#UttarPradesh पुलिस से बर्खास्त किए गए सिपाही Sunil Kumar Shukla का बयान चर्चा में है।
— News & Features Network | World & Local News (@newsnetmzn) June 28, 2026
बर्खास्तगी के बाद उन्होंने कहा, “मेरी बर्खास्तगी ईस्ट इंडिया बीजेपी के विजय रथ के ताबूत की आखिरी कील साबित होगी।”
Sunil Shukla पहले भी पुलिस विभाग में भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर मुखर रहे… pic.twitter.com/tTpvMs10IJ
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