ऑपरेशन टाइगर पर संकट: पवनराजे मर्डर केस के फैसले ने बदल दी महाराष्ट्र की सियासी बिसात
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महाराष्ट्र की राजनीति में ऑपरेशन टाइगर इन दिनों चर्चा का केंद्र बना हुआ है। उद्धव ठाकरे गुट (शिवसेना-UBT) के 9 में से 6 सांसदों के पाला बदलने की अटकलों के बीच, पवनराजे निंबालकर हत्याकांड में आए कोर्ट के फैसले ने पूरे समीकरण को हिला कर रख दिया है।

फैसले से बदली कहानी धाराशिव के सांसद ओमराजे निंबालकर, जो इस ऑपरेशन के संभावित बागियों में शामिल थे, के पिता पवनराजे निंबालकर हत्याकांड में सीबीआई कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने पूर्व मंत्री पद्मसिंह पाटिल समेत सभी आरोपियों को बरी कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि केवल सरकारी गवाहों के बयानों और उनके बार-बार पलटने के कारण सजा नहीं दी जा सकती।

क्या थी ऑपरेशन टाइगर की डील? सियासी गलियारों में चर्चा थी कि ओमराजे निंबालकर ने बगावत के बदले यह शर्त रखी थी कि उनके पिता हत्याकांड का कानूनी फैसला उनके पक्ष में आएगा। हालांकि, अब सभी आरोपियों के बरी होने से यह कथित डील फेल होती दिख रही है। इसी के साथ ऑपरेशन टाइगर की सफलता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

अगले 48 घंटे बेहद अहम फैसले के बाद ओमराजे निंबालकर ने स्थिति स्पष्ट की है। उन्होंने कहा, मैं अगले दो दिनों में अपने राजनीतिक रुख पर फैसला लूंगा। मेरा फैसला चाहे जो भी हो, मैं उद्धव और आदित्य ठाकरे के खिलाफ न कभी बोला हूं और न बोलूंगा।

ओमराजे ने स्पष्ट किया कि 2022 में भी उनके पास पार्टी छोड़ने का मौका था, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। उनका यह बयान संकेत दे रहा है कि वे अब पाला बदलने के बजाय उद्धव ठाकरे के साथ बने रह सकते हैं।

कैसे फेल होगा ऑपरेशन टाइगर? दलबदल कानून के तहत, किसी भी पार्टी में कानूनी तौर पर टूट के लिए दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होती है। शिवसेना (UBT) के 9 में से 6 सांसदों का समर्थन बागी गुट को अपनी सदस्यता बचाने के लिए जरूरी है।

यदि ओमराजे निंबालकर वापस उद्धव गुट के साथ मजबूती से खड़े हो जाते हैं, तो बागियों की संख्या घटकर 5 रह जाएगी। इस स्थिति में, यदि वे बगावत करते हैं, तो उनकी संसद सदस्यता रद्द होना तय है। ओमराजे का यह रुख ऑपरेशन टाइगर के लिए सबसे बड़ा झटका साबित हो सकता है।

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