बुर्का और पर्दा प्रथा पर इम्तियाज अली का बड़ा बयान, बोले- पाबंदियों को सहज मान लेना चिंताजनक
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अपनी संजीदा फिल्मों और मजबूत महिला किरदारों के लिए मशहूर फिल्म निर्देशक इम्तियाज अली एक बार फिर चर्चा में हैं। इस बार वजह उनकी कोई फिल्म नहीं, बल्कि बुर्का और पर्दा प्रथा पर दिया गया उनका एक विवादास्पद बयान है। एक इंटरव्यू का क्लिप वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है।

क्या है मामला? अनफिल्टर्ड बाय समदीश को दिए एक इंटरव्यू में इम्तियाज अली ने समाज में व्याप्त कुछ रूढ़िवादी परंपराओं पर अपनी राय रखी। बुर्का और पर्दे का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि जब कोई महिला यह कहती है कि वह इसमें सहज (comfortable) महसूस करती है, तो उन्हें यह बात परेशान करती है।

पाबंदियों को सामान्य मानना गलत इम्तियाज का तर्क है कि किसी भी ऐसे सामाजिक ढांचे को सामान्य या आरामदायक मान लेना, जो व्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करता हो, समाज के लिए एक चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि जब कोई व्यक्ति पाबंदियों को ही अपनी सहजता बना ले, तो यह संकेत है कि लंबे समय से चली आ रही बंदिशें उनकी सोच का हिस्सा बन चुकी हैं। उनके अनुसार, बिना सवाल किए पाबंदियों को स्वीकार करना एक स्वस्थ समाज की पहचान नहीं है।

किसी को निशाना बनाना मेरा मकसद नहीं विवाद बढ़ता देख निर्देशक ने सफाई दी कि उनका इरादा किसी धर्म या समुदाय को निशाना बनाना नहीं था। उन्होंने कहा, मैं किसी को बताने वाला कौन होता हूं कि उन्हें क्या पहनना चाहिए? हर किसी को अपनी जिंदगी अपनी शर्तों पर जीने का पूरा हक है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह केवल एक सामाजिक चर्चा की शुरुआत करना चाहते थे।

सोशल मीडिया पर दो फाड़ हुआ समाज इम्तियाज के बयान के बाद इंटरनेट पर प्रतिक्रियाओं का सैलाब आ गया है। कुछ लोग उनके विचारों का समर्थन करते हुए कह रहे हैं कि महिलाओं की स्वतंत्रता और सामाजिक दबावों पर बात होना जरूरी है। वहीं, बड़ी संख्या में लोग इसका विरोध भी कर रहे हैं। आलोचकों का तर्क है कि अगर कोई महिला अपनी मर्जी से बुर्का पहनती है, तो यह उनकी व्यक्तिगत पसंद और धार्मिक आजादी है, जिसका सम्मान होना चाहिए।

बढ़ती कट्टरता पर जताई चिंता इंटरव्यू के दौरान इम्तियाज ने यह भी कहा कि आज के समय में संतुलित चर्चा करना मुश्किल हो गया है। लोग हर राय को तुरंत समर्थन या विरोध के सांचे में ढाल देते हैं। उन्होंने कहा कि मतभेद होना सामान्य है, लेकिन हमें एक-दूसरे के साथ सम्मानपूर्वक संवाद करने की क्षमता खोनी नहीं चाहिए।

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