G7 का सदस्य नहीं, फिर भी क्यों हर शिखर सम्मेलन की शान बना भारत?
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क्या है G7? G7 यानी ग्रुप ऑफ सेवन , दुनिया की सात सबसे विकसित और बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का एक अनौपचारिक समूह है। 1975 में स्थापित इस समूह का मुख्य उद्देश्य वैश्विक आर्थिक चुनौतियों से मिलकर निपटना है। इसमें अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान और कनाडा शामिल हैं। यूरोपीय संघ भी इसमें हिस्सा लेता है, लेकिन उसे आधिकारिक सदस्य नहीं माना जाता।

भारत सदस्यता की दौड़ में क्यों नहीं? भारत दुनिया की 5वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, इसके बावजूद वह G7 का सदस्य नहीं है। इसका मुख्य कारण यह है कि G7 की सदस्यता लंबे समय से स्थिर है और समूह के पास नए देशों को शामिल करने के लिए कोई औपचारिक प्रक्रिया या विस्तार की स्पष्ट नीति नहीं है।

क्यों हर बार मिलता है बुलावा? सदस्य न होने के बावजूद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लगातार शिखर सम्मेलनों में विशेष अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया जाता है। फ्रांस के एवियन में शुरू हुए इस वर्ष के शिखर सम्मेलन में भी भारत की भागीदारी रणनीतिक रूप से अहम है। इसके पीछे कई ठोस कारण हैं:

1. आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभरता भारत भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। वैश्विक व्यापार, निवेश और मजबूत होती सप्लाई चेन में भारत की भूमिका को विकसित देश नजरअंदाज नहीं कर सकते।

2. ग्लोबल साउथ की बुलंद आवाज भारत विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के हितों का अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नेतृत्व करता है। ग्लोबल साउथ की आवाज के रूप में भारत की भूमिका उसे एक आवश्यक मध्यस्थ (Mediator) बनाती है।

3. भू-राजनीतिक और रणनीतिक महत्व इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत एक प्रमुख रणनीतिक साझेदार है। वैश्विक सुरक्षा और भू-राजनीतिक संतुलन बनाए रखने के लिए G7 देश भारत के साथ संवाद को अनिवार्य मानते हैं।

4. भविष्य के मुद्दों पर नेतृत्व स्वच्छ ऊर्जा, हरित विकास और जलवायु परिवर्तन जैसे वैश्विक विषयों पर भारत की नीतियां दुनिया के लिए एक मॉडल बन रही हैं। इन चुनौतियों का सामना करने के लिए G7 देशों को भारत के सहयोग की सख्त जरूरत है।

संक्षेप में, भारत का G7 में आमंत्रण महज एक औपचारिकता नहीं, बल्कि वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती धमक और अपरिहार्यता का प्रमाण है।

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