उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर समाजवादी पार्टी (सपा) के भविष्य को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं। प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने दावा किया है कि सपा जल्द ही टूट सकती है। मौर्य ने तो यहां तक कह दिया कि सपा के करीब दो-तिहाई सांसद पार्टी छोड़ने को तैयार हैं। इन दावों में कितनी सच्चाई है, यह तो भविष्य बताएगा, लेकिन सपा का पिछला 34 साल का इतिहास टूट और बगावत की कहानियों से भरा पड़ा है।
समाजवादी पार्टी की स्थापना 4 अक्टूबर 1992 को मुलायम सिंह यादव ने की थी। जनता दल के बिखराव के बाद बनी इस पार्टी ने डॉ. राम मनोहर लोहिया के समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय को अपना आधार बनाया। मंडल राजनीति के दौर में साइकिल के निशान वाली यह पार्टी किसानों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की आवाज बनकर उभरी।
1993 में सपा और बसपा के ऐतिहासिक गठबंधन ने भाजपा को सत्ता से दूर रखा। हालांकि, यह दोस्ती ज्यादा दिन नहीं चली और 1995 का गेस्ट हाउस कांड सपा के इतिहास का सबसे काला अध्याय बन गया। इस घटना ने सपा-बसपा को कट्टर दुश्मन बना दिया और पार्टी के भीतर गुटबाजी की नींव रख दी।
सपा के सफर में कई दिग्गज नेताओं ने किनारा किया। राज बब्बर, बेनी प्रसाद वर्मा और अमर सिंह जैसे प्रभावशाली नेता पार्टी से अलग हुए। आजम खान का 2009 में नाराजगी जताना और फिर वापसी करना पार्टी की आंतरिक कलह को दर्शाता रहा। कल्याण सिंह के साथ सपा की नजदीकी ने भी पार्टी के भीतर मुस्लिम वोट बैंक को लेकर बड़े मतभेद पैदा किए थे।
सपा के इतिहास की सबसे बड़ी टूट 2016-17 में हुई, जब पिता मुलायम सिंह यादव और पुत्र अखिलेश यादव के बीच वर्चस्व की लड़ाई छिड़ गई। चुनाव आयोग तक पहुंची यह जंग साइकिल के निशान पर अखिलेश के कब्जे के साथ खत्म हुई। शिवपाल यादव ने अलग पार्टी बनाई, हालांकि 2022 के बाद वे फिर सपा में लौट आए।
2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने 37 सीटों पर जीत हासिल कर सबको चौंका दिया और देश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी। वर्तमान में विधानसभा में पार्टी के पास लगभग 102 विधायक हैं। अखिलेश यादव अब पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के साथ पार्टी को आगे बढ़ा रहे हैं।
उपमुख्यमंत्री केशव मौर्य का दावा कि सपा के 25-26 सांसद पार्टी छोड़ने की कतार में हैं, पार्टी की अंदरूनी बेचैनी की ओर इशारा करता है। 2024 के राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग की घटना ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि पार्टी में सब कुछ सामान्य नहीं है।
तमाम उतार-चढ़ाव और पारिवारिक कलह झेलने के बाद भी सपा आज उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी विपक्षी ताकत बनी हुई है। हालांकि, मौर्य के बयान ने एक बार फिर बहस छेड़ दी है कि क्या अखिलेश की नई सपा अपने पुराने बिखराव के इतिहास को दोहराएगी या फिर इन दावों को राजनीतिक जुमले साबित करेगी? 2027 के विधानसभा चुनाव इस दांव-पेंच का असली केंद्र होंगे।
#WATCH | Kanpur | Uttar Pradesh Deputy CM Keshav Prasad Maurya says, 25–26 MPs of the Samajwadi Party are ready to break away, but we are not breaking away at all. We know that they will themselves break away from the party...
— ANI UP/Uttarakhand (@ANINewsUP) June 17, 2026
(17.06) pic.twitter.com/82ZDq9TQmn
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