कोटा में राहुल गांधी का छात्र संवाद : शिक्षा और रोजगार तंत्र पर तीखे हमले
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लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने राजस्थान के कोचिंग हब कोटा में छात्रों और अभिभावकों के साथ सीधा संवाद किया। कांग्रेस के छात्रों की गूंज अभियान के तहत आयोजित इस कार्यक्रम में शिक्षा व्यवस्था, रोजगार की कमी और युवा पीढ़ी के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर चर्चा हुई।

प्रतियोगी परीक्षाओं का बढ़ता दबाव राहुल गांधी ने इस बात पर गहरी चिंता जताई कि देश के लाखों युवा मेडिकल, इंजीनियरिंग, यूपीएससी और एसएससी जैसी परीक्षाओं के चक्रव्यूह में फंसे हैं। उन्होंने कहा कि करोड़ों युवा सालों तक कड़ी मेहनत करते हैं, लेकिन अवसरों की कमी के कारण सफलता का प्रतिशत बेहद कम है। यह स्थिति युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ है।

आर्थिक बोझ और कर्ज का संकट संवाद के दौरान राहुल ने परिवारों की बदहाली का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि बेहतर भविष्य की उम्मीद में परिवार अपनी जमा-पूंजी और कई बार कर्ज लेकर बच्चों को कोचिंग और हॉस्टल का खर्च उठा रहे हैं। इसके बावजूद रोजगार की कोई गारंटी न होना, परिवारों को आर्थिक और मानसिक रूप से तोड़ रहा है।

मानसिक स्वास्थ्य और आत्महत्या की चुनौती कार्यक्रम में आए अभिभावकों ने छात्रों पर बढ़ते दबाव और आत्महत्या के मामलों पर भावुक चिंता जताई। राहुल गांधी ने माना कि सिस्टम में सफलता का अत्यधिक दबाव छात्रों की मानसिक सेहत को गंभीर नुकसान पहुंचा रहा है। उन्होंने सरकार और शिक्षण संस्थानों से मानसिक स्वास्थ्य सहायता प्रणाली को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

डिग्री नहीं, रोजगार चाहिए राहुल गांधी ने मौजूदा शिक्षा प्रणाली को आड़े हाथों लेते हुए सवाल किया कि शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री बांटना नहीं, बल्कि हुनर और रोजगार देना होना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि शिक्षित युवा आज भी स्थायी रोजगार के लिए तरस रहे हैं और अंत में असंगठित क्षेत्र में अस्थायी काम करने को मजबूर हैं।

कोचिंग बनाम दबाव की असल जड़ इस दौरान मनोचिकित्सक डॉ. एमएल अग्रवाल ने एक महत्वपूर्ण पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि तनाव की असली वजह केवल कोचिंग नहीं है, बल्कि बच्चों पर जबरन विषय थोपना है। उन्होंने बच्चों की रुचि के अनुसार शिक्षा देने की वकालत की।

सुधार की मांग और राजनीतिक बहस राहुल गांधी ने शिक्षा, रोजगार और मानसिक स्वास्थ्य को एक-दूसरे से जुड़ा बताते हुए व्यापक सुधारों की मांग की है। कोटा का यह संवाद केवल समस्याओं को सुनने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने आने वाले समय के लिए देश के शिक्षा ढांचे पर एक बड़ी राजनीतिक और सामाजिक बहस छेड़ दी है।

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